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नेपाली कांग्रेस को तो हारना ही था

चंद दिनों में पूर्व होने वाले प्रधानमंत्री गिरिाा प्रसाद कोइराला की ताजा उपलब्धि क्या रही है? ‘उन्होंने संविधान सभा चुनाव बिना अधिक खून-खराबे के संपन्न करा दिया।’ उनसे मिलने वाले डिप्लोमेट, नेता और बड़ी हस्तियां उन्हें इसी बात की बधाई देती फिर रही हैं। पार्टी में भी गिरिाा बाबू के चाहनेवाले इसे दोहराते जा रहे हैं। ‘चुनाव के बाद गिरिाा बाबू राजनीति से संन्यास ले लेंगे और उनकी गद्दी उनकी सुपुत्री सुजाता कोइराला संभालेंगी।’ ये दोनों बातें पूरी होती हैं, या नहीं। इसका भी इंतजार नेपाल की जनता को है। बालुआटार स्थित प्रधानमंत्री निवास में पार्टी की हार से अधिक दुख परिवार के सदस्यों की हार से है। सुजाता कोइराला, सुशील कोइराला, डॉ. शेखर कोइराला, चक्रप्रसाद वास्तोला जसे परिवार के प्रमुख सदस्यों का हारना कोई मामूली बात नहीं है। लाज बची तो डॉ. शशांक कोइराला से, जो दिवंगत वी. पी. कोइराला के सबसे छोटे पुत्र हैं। वे नवलपरासी से जीत गए। संसदीय चुनाव परिणाम से नेपाल की जनता ने अपने पड़ोसी देश भारत को एक संदेश ोजा है कि वंशवाद की राजनीति हमें बर्दाश्त नहीं। अब भारत के नेाताओं के ऊपर निर्भर है कि वे नेपाल के चुनावी नतीजों से सीख लेते हैं, या नहीं। अंतिम परिणाम में संविधान सभा और समानुपातिक प्रतिनिधित्व दोनों जगहों पर नेपाली कांग्रेस दूसर और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एमाले) तीसर पायदान हैं। परिणाम में पहले और दूसर नंबर के बीच का फासला इतना बड़ा है कि नेपाली कांग्रेस के नेता अपनी पीठ भी नहीं ठोक सकते। यह एमाले नेता माधव कुमार नेपाल और उनके मंत्रियों की राजनीतिक ईमानदारी कही जाएगी कि हार के तुरंत बाद उन्होंने पार्टी के पदों और सरकार से इस्तीफा दे दिया। नेपाली कांग्रेस की हार की पृष्ठभूमि चुनाव से पहले ही बन गई थी। गिरिाा बाबू के पद मोह और परिवार मोह से सभी वाकिफ हैं। कार्यवाहक सभापति के पद पर सुशील कोइराला को बैठाना और पुत्री सुजाता कोइराला को मंत्री बनाने वाली बातें पार्टी के समर्पित कायकर्ताओं के बीच संशय का सबब बनती रहीं। पार्टी उम्मीदवारों के टिकट जिले से लेकर केन्द्रीय समिति ने तय नहीं किए। उसे या तो सुशील कोइराला के निवास पर तय किया जाता, या फिर शेर बहादुर देउबा के निवास पर। टिकटें तय करनेवालों में सबसे बड़ी भूमिका सुजाता कोइराला, दिलबहादुर धर्ती, गोपाल पहाड़ी, पुरुषोत्तम बस्नेत और फमरुल्लाह मंसूर की रही है। नेपाली कांग्रेस के वरिष्ठ नेता देवेन्द्र लाल नेपाली कहते हैं- ‘हार के कई कारणों में प्रमुख, पारिवारिक गिरोहों का टिकट वितरण में हावी होना भी रहा है।’इस समय नेपाली कांग्रेस में केन्द्रीय और जिला स्तरों पर जांच चल रही है कि कौन किन कारणों से हारा। नेता और कार्यकर्ता एक-दूसर के कपड़े फाड़ने और ठीकरा फोड़ो कार्यक्रम में लगे हैं। ‘भितरघातियों’ और बूथ छोड़कर भागने वालों का निलंबन जारी है। आरोप माओवादियों के यूथ कम्युनिस्ट लीग पर लगाया जा रहा है कि उनकी हिंसा और डराने-धमकाने से चुनाव में नेपाली कांग्रेस की हार हुई। यूथ कम्युनिस्ट लीग को विघटित करने की मांग एमाले भी कर चुकी है। लेकिन यह माओवादियों को मंजूर नहीं। आस्ट्रेलिया, अमेरिका, यूरोप के पर्यवेक्षक तक कह गए कि परिणाम बुलेट से नहीं, बैलेट से तय हुआ है। अमेरिकी राजदूत नैंसी पावेल ने भी भरोसा दिया है कि नेपाली माओवादियों पर से अतिवादी होने का ठप्पा जल्दी हट जाएगा। लेकिन प्रचंड कहते हैं कि हम ‘रैडिकल’ बने रहेंगे। संविधान सभा की 240 में से 120 सीटों पर जीत का मतलब है कि माओवादी चाहकर भी प्रचंड को राष्ट्रपति बनाने की हालत में नहीं है। उन्हें सिर्फ साधारण बहुमत मिला है। संविधान बदलने के लिए दो तिहाई बहुमत चाहिए। देश के प्रथम राष्ट्रपति राम राजा प्रसाद सिंह भी बनना चाहते थे। पर कार्यपालिका का प्रमुख स्वयं प्रचंड क्यों बनना चाहते हैं? क्या उन्हें अपने बाद के नेता बाबू राम भट्टराई पर भरोसा नहीं है? बात भरोसे की निकली है तो बताते चलें कि प्रचंड की निजी सुरक्षा उनके पुत्र प्रकाश दहाल करते हैं। प्रचंड के सिक्योरिटी कमांडर प्रकाश दहाल बीसियों विश्वस्त कमांडों को साथ रखते हैं, जो एम-16 और कोल्ट हथियारों से लैस हैं। माओवादी कमांडरों के अनुसार, ‘प्रकाश ने कोई ट्रेनिंग भी नहीं ली है।’ प्रकाश दहाल आधिकारिक यात्रा पर पिछले साल पेइचिंग भी जा चुके हैं। कई यूरोपीय राजधानियों में जा चुके प्रकाश दहाल स्विटारलैंड के बर्न, फ्राइबर्ग और जेनेवा में डीएफए की स्टडी ट्रिप पर अपने पिता प्रचंड के साथ थे। अब पता नहीं स्विस अखबारों ने कितना सही लिखा कि जनवरी 2007 की इस यात्रा और उससे पहले माओवादी नेताओं ने अरबों की राशि स्विटारलैंड के बैंकों में जमा किए। अगर यह सही है तो मुद्रा और संतान मोह से माओवादी नेता भी बाहर नहीं हैं। तीन बातों की चिंता सबसे ज्यादा है। पहला, माओवादी सरकार पशुपति से तिरुपति तक का गलियारा मजबूत करने में न लग जाए। दूसरा, नेपाल के माओवादी नेता चीन की गोद में न बैठ जाएं। और तीसरी चिंता 10 की भारत-नेपाल संधि को लेकर है। यह समीक्षा करने वाली बात है कि भारत के माओवादियों की नेपाल के माओवादियों से कितनी बनती है। ऐसा संभव भी नहीं है कि नेपाली माओवादी एक गैरािम्मेदार सरकार के रूप में दुनिया के सामने आएं। इसके अलावा सरकार में जो तराई के नेता शामिल हो रहे हैं, वे माओवाद के ‘आयात-निर्यात’ में अंकुश का काम करंगे। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि सुरक्षा एजेंसियां आंख ही मूंद लें। यह बताने की जरूरत नहीं कि राजनीति से ज्यादा चीन आर्थिक दोहन में विश्वास करता है। जो नेता और विचारक नेपाल की राजनीति और अर्थव्यवस्था में चीनी घुसपैठ को लेकर चिंतित हैं वे शायद भूल जाते हैं कि भारत में एसी से लेकर देवी-देवताओं की मूर्तियां तक चीन से आ रही हैं। नेपाल के साथ ज्वाइंट वेंचर में भारत 41.38 प्रतिशत योगदान कर नंबर वन पर है। 8.12 प्रतिशत योगदान करने वाला अमेरिका तीसर और 4.प्रतिशत निवेश करने वाला चीन तीसर नंबर पर है। यह भारत पर निर्भर करता है कि वह इसे कैसे मेंटेन कर। जहां तक 10 की संधि की बात है तो उसके परखचे तभी उड़ गए थे जब नेपाल ने बिना भारत को बताए चीन से हथियार मंगाए थे। 10 के नेपाल में और 2008 के नेपाल में बहुत फर्क आ चुका है। इस संधि के ‘असमान’ प्रावधानों की समीक्षा तो होनी ही चाहिए। लेकिन सबसे पहले वहां संविधान सभा का गठन जरूरी है। एमाले और नेपाली कांगेस के नेता सरकार में न सही, बाहर से समर्थन देकर भी नए नेपाल का नया संविधान बना सकते हैं।ड्ढr लेखक ईयू-एशिया न्यूज के नई दिल्ली स्थित संपादक हैं

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