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सच्ची प्रार्थना

एक चिंतक ने कहा है- ‘प्रार्थना विश्वास की प्रतिध्वनि है। रथ के पहियों में जितना अधिक भार होता है, उतना ही गहरा निशान वे धरती पर बना देते हैं। प्रार्थना की रखाएं लक्ष्य तक दौड़ी जाती हैं और मनोवांछित सफलता खींच जाती है। प्रार्थना आत्मा की आध्यात्मिक भूख है।’ यह तो ज्ञानी, चिन्तक, ऋषि-मुनि की बात हुई। लेकिन जो पढ़े लिखे तक नहीं हैं उनका आसरा भी प्रार्थना ही है। हारत मूसा जंगल से गुजर रहे थे। उन्होंने एक गड़रिए को प्रार्थना करते देखा। रुक कर उसकी प्रार्थना सुनी तो आग बबूला हो गए। इससे तो अच्छा कि कोई प्रार्थना ही न कर। वह कह रहा था: हे प्रभु, अर मुझे अपने पास बुला ले। मैं तुझे रो नहलाऊंगा। मेरी ोड़ों को देखते हो, कैसे नहलाता हूं। ऐसे ही रगड़-रगड़ कर तुझे साफ करूंगा। जुआं पड़ जाएं तो वह भी निकाल दूंगा। ोड़ों के जुएं निकालते-निकालते इस काम में माहिर हो गया हूं। बात बर्दाश्त से बाहर हो गई तो मूसा ने कहा- रुक नालायक! तू ईश्वर के जुएं निकालेगा? यह कोई प्रार्थना है? गड़रिया डर गया। पैर पकड़ लिए। उसने कहा: मुझे कुछ आता नहीं। मैं तो बेपढ़ा लिखा हूं। बस ोड़ों से ही बात करना जानता हूं, यही मेरा सत्संग है, यही मेरी भाषा। अच्छी बातें कहां से लाऊं। मूसा ने उसे एक लंबी प्रार्थना बता दी। गड़रिया बोला- इसे मैं कभी याद न रख सकूंगा। अगर इसमें शब्द आगे पीछे हो जाएंगे तो फिर पाप होगा। मेरी जो प्रार्थना है वह मेरी ही बनाई हुई है। जब दिल हुआ, जसा चाहा बना लिया। फिर भी मूसा ने लंबी प्रार्थना उसे याद करा दी और चल पड़े। आगे उन्होंने आकाशवाणी सुनी - ‘मूसा मैंने तुझे पृथ्वी पर ोजा कि तू लोगों को मुझसे जोड़ना। पर तूने तो तोड़ना शुरू कर दिया। वह आदमी मुझसे जुड़ा था, तू उसे तोड़ आया। अब उसकी प्रार्थना में कोई प्राण ही नहीं है। उसकी पहली प्रार्थना में हृदय है, प्रेम है। मूसा वापस गए। क्षमा मांगी। गड़रिए से पहले वाली प्रार्थना जारी रखने को कहा।’

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