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खेती की खोज

भविष्य के किसी वर्ष की बात है। भारत में दस साल से वृद्धि दर बीस प्रतिशत से ऊपर थी और इस वर्ष पचीस प्रतिशत रहने का अनुमान था। लोग खुशहाल थे, जो अमीर थे वे अपनी अमीरी में खुश थे, जो अमीर नहीं थे वे इस उम्मीद में खुश थे कि वे भी किसी दिन अमीर हो जाएंगे, गरीबी की रखा के नीचे रहने वाले लोग उनकी खुशी में खुश थे। आकलन यह था कि अगर वृद्धि दर पचास प्रतिशत को पार कर जाए तो कोई गरीबी की रखा के नीचे नहीं रहेगा।ड्ढr ऐसे में पता चला कि देश में अनाज का भारी संकट है। मुद्रास्फीति इतनी थी कि रिार्व बैंक ने अपने स्ट्रांग रूम में अनाज की बोरियां रखवाईं कि कोई लूट न ले। पता लगाया गया कि अनाज की ऐसी कमी क्यों हो गई? विशेषज्ञों ने बताया कि इस साल फसल कम हुई है। सबसे बड़ी वजह यह थी कि बहुत कम जमीन पर खेती होती थी। तेज विकास के चलते ज्यादातर जमीन पर कारखाने, दफ्तर और रिहायशी इमारतें बन गई थीं। थोड़ी बहुत जमीन जंगलात के नाम थी, जहां रिाॉर्ट बने हुए थे। पानी की कमी हो गई थी। सारी नदियों को जोड़ दिया गया था सो जिन नदियों में पानी था, वह बह कर उन नदियों में चला गया, जिनमें पानी नहीं था, और वह पानी बह गया, जो बचा वह पीने और उद्योगों के लिए इस्तेमाल हो गया। यह तय पाया गया कि अधिक अन्न उपजाने के लिए तुरंत उपाय किए जाएं। इसके लिए प्रधानमंत्री की ओर से एक कमेटी बनाई गई। एक कमेटी कृषि मंत्रालय ने भी बनाई, एक सिंचाई मंत्रालय ने, एक ग्रामीण विकास मंत्रालय ने, एक पर्यावरण मंत्रालय ने, एक विज्ञान और टैक्नोलॉजी मंत्रालय ने। कुछ कमेटियां इन सार विभागों ने मिलकर बनाईं। कमेटियों में तालमेल के लिए भी कमेटी बनाई गई। ढेर सारी बैठकें हुईं। एक बैठक में यह विचार आया कि जमीनी हकीकत जानने के लिए मौकाए वारदात पर पहुंचा जाए। तो तमाम राज्य सरकारों को खबर की गई कि अपने-अपने राज्य में जहां खेती होती हो, उसकी इत्तिला दें। कहीं-कहीं खेती होने के संदिग्ध मामले सामने आए। जब यह पक्की खबर मिली कि किसी एक राज्य में एक किसान है, जिसके पास दो-चार एकड़ जमीन है, जिस पर वह खेती करता है, तो कमेटी ने वहां जाने का निश्चय किया। जब कमेटी के सदस्य दुर्गम रास्ते पार करते हुए वहां पहुंचे तो पता चला कि एक बिल्डर उनके पहले वहां पहुंच गया था, और किसान अपनी जमीन उसे बेच कर जा चुका था।

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