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जी-20 शिखर सम्मेलन के आगे

भारत के लोग राष्ट्रीय चुनावों में व्यस्त हैं। हमारा सारा ध्यान इन अटकलों पर है कि कौन सी पार्टी सत्ता में आएगी और कैसे स्थिर सरकार का गठन होगा? फिर चर्चा के लिए चुनाव और नतीजों के सव्रेक्षण हैं। साफ तौर पर इन चुनावों में विकास के मुद्दों पर ज्यादा ही जोर है। एनडीटीवी के सव्रेक्षण में नीतीश कुमार को विकास के मोर्चे पर 78 प्रतिशत और बाढ़ प्रबंधन के मुद्दे पर 73 प्रतिशत रटिंग दी गई है। सव्रेक्षण ने नेतृत्वकारी गुणों के मुद्दे पर उन्हें अपने प्रतिद्वंद्वियों के मुकाबले काफी ऊंची रटिंग दी है। अगर ये सव्रेक्षण सही हैं तो इससे गठबंधन की राजनीति में तात्विक परिवर्तन होगा। उधर दुनिया किसी और मोर्चे पर यानी वैश्विक अर्थव्यवस्था के पुनरुत्थान में लगी हुई है। हम सभी जानते हैं कि यह 1ी महामंदी के बाद का सबसे बड़ा आर्थिक संकट है। महामंदी के समय दुनिया कार्रवाई के लिए एकाुट नहीं हो पाई थी। उसकी वजह से व्यापक बेरोगारी आई, आय की क्षति हुई, गरीबी बढ़ी और इंसानी मुश्किलों का पहाड़ खड़ा हो गया। इस बार की मंदी उससे काफी अलग है। लंदन में हुई जी-20 की बैठक का यही सार है। जी-20 दुनिया के 20 सबसे अमीर देशों का समूह है, जिनके भीतर दुनिया की 0 फीसदी आबादी निवास करती है और जिससे दुनिया का 80 फीसदी जीडीपी तैयार होता है। इस बैठक की आरंभिक चर्चाओं में भारत, चीन , दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील के बाजारों को शामिल नहीं किया जाता था। लेकिन अपनी आर्थिक ताकत के कारण अब वे वैश्विक निर्णय प्रक्रिया के हिस्से हो गए हैं। तो जी-20 ने क्या हासिल किया? सबसे पहले और सबसे खास बात यह है कि जी-20 की बैठक भरोसा कायम करने का प्रयास थी। इसमें बाजार, उपभोक्ता और सभी भागीदारों के लिए यह संदेश था कि दुनिया एकाुट होकर काम कर रही है न कि अकेले। यह इस बात का भी संकेत है कि आर्थिक मंदी को पलटने के लिए दुनिया साहसिक और आक्रामक कदम उठाने को तैयार है। बाजार संकेतों पर काम करते हैं। विश्वास बहाली के इस संकेत ने अस्थायी तौर पर भारत सहित सभी शेयर बाजारों में उछाल पैदा कर दिया है। दूसरी बात यह है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में 10 खरब डॉलर का अतिरिक्त प्रवाह वित्तीय और ऋण प्रणाली की मरम्मत करगा। इससे आर्थिक संकट से प्रभावित देशों और संस्थाओं को राहत मिलेगी।10 खरब डॉलर के प्रोत्साहन से निश्चित तौर पर उम्मीदों में सुधार होगा। इससे कई देशों, विशेषकर पूर्वी यूरोप के उन देशों को तात्कालिक राहत मिलेगी, जो अचानक भुगतान के संतुलन के संकट से गुजर रहे हैं। तीसरी बात यह है कि जी-20 अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के संसाधनों को तीन गुना करने पर सहमत हो गया है। जिन देशों में पूंजी का आगमन और निर्यात रुक गया है, वे विदेशी मुद्रा की आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर सकते। वे भुगतान के संतुलन के संकट से गुजर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के संसाधनों को तीन गुना किए जाने से इन देशों की जरूरतें पूरी हो सकेंगी। इससे भी मजबूत सकारात्मक संकेत जाएगा। चौथा फैसला, दुनिया के वित्तीय और ऋण बाजार को सक्रिय करने का है। वित्त और ऋण की उपलब्धता के बिना भारत और अन्य जगहों पर नए निवेश का दृष्टिकोण निराशावादी रहता है। ऋण की उपलब्धता से उन तमाम निर्माणाधीन परियोजनाओं में जान आएगी, जो अचानक रुक गई थीं। सम्मेलन का पांचवां फैसला, विश्व बैंक के संसाधनों को बढ़ाने का है, जिससे विश्व बैंक की र्का देने की नई क्षमता बनेगी। इसके मायने हैं कि भारत जसे देश के लिए और संसाधन उपलब्ध होंगे। अगर भारत के लिए विश्व बैंक के संसाधन तत्काल बढ़ाए जा सकें तो उससे कई बड़ी ढांचागत परियोजनाओं को फाइनेंस किया जा सकता है। छठी बात यह है कि आम आदमी की कीमत पर बाजार की ज्यादतियों और लालच के खिलाफ जबर्दस्त जनमत है। जी-20 समूह के देशों की तरफ से नियामक संस्थाओं को मजबूत करने, बाजार की निगरानी को सुधारने और बेहतर प्रवर्तन से बाजार में भरोसा बहाल करने में मदद मिलेगी। सातवीं, बात कर अदा करने और कर मुक्त क्षेत्रों पर कार्रवाई करने की है, जिससे कॉरपोरट जगत और व्यक्ितयों पर यह दबाव पड़ेगा कि स्विटरलैंड और कर मुक्त क्षेत्रों में रखे धन को अपने देश में वापस लाएं। भारत के लिए इसका मतलब है, हमारी अर्थव्यवस्था में बड़े पैमाने पर अतिरिक्त निजी पूंजी का आगमन। आठवीं बात उस मान्यता की है, जिसके तहत भारत और चीन जसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं के प्रबंधन में ज्यादा महत्व दिया जाना चाहिए। इसका मतलब है कि उनका मताधिकार और कोटा ज्यादा उच्च स्तरीय हो और निर्णय प्रक्रिया में उनकी बात को और तवज्जो दी जाए। अब तक यह भाषण और नारों की चीज रही है। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं की मौलिक चीर-फाड़ के लिए मौजूदा संकट के खत्म होने का इंतजार करना होगा। फिर वैश्विक वित्तीय प्रणाली में बुनियादी सुधार के लिए ज्यादा लंबा वक्त चाहिए। हालांकि परिवर्तन के बीज मौजूदा संकट के दौरान पड़ गए हैं। आखिर में भारतीय नारिए से देखने पर मुझे लगता है कि यह हमारी वर्तमान आर्थिक प्रासंगिकता और रसूख की नई पहचान है। वैश्विक आर्थिक निर्णय प्रक्रिया में शामिल किए जाने का मनौवैज्ञानिक और वास्तविक दोनों तरह का महत्व है। वास्तव में यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि अगले कुछ सालों में भारतीय अर्थव्यवस्था कितना अच्छा कर सकती है। अगर हमारी वृद्धि दर तेजी से नीचे आती है और तत्काल चढ़ना नहीं शुरू करती है तो दमदार आवाज के लिए हमारा दावा कमजोर हो जाएगा। दूसरी तरफ अगर नई सरकार कुछ कठिन आर्थिक फैसले लेती है तो उससे आर्थिक तरक्की बहाल हो सकती है। फिर उच्च स्तरीय मंडल में हमारी जगह सुनिश्चित हो जाएगी। मौजूदा चुनाव का परिणाम बहुत महत्वपूर्ण होने वाला है। विशेष कर उस पर हमारी घरलू वृद्धि को पुनर्जीवित करने, नए रोगार पैदा करने, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करने, गरीबी को कम करने, बेहतर ढांचा हासिल करने और शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की कोशिशें निर्भर हैं। उसी के बूते पर भारत दुनिया के मंच पर फिर से स्थापित होगा। निश्चित तौर पर जी-20 की यह बैठक विश्वास कायम करने का एक प्रयास था। यह मौका भी है, जिस दौरान भारत अपनी आंतरिक व्यवस्था को दुरुस्त कर सकता है। मई का चुनाव भारत के भविष्य के लिए दूरगामी महत्व का है। अगर हम सही फैसला लेते हैं तो महान अवसर हमारा इंतजार करता मिलेगा। ठ्ठड्डठ्ठस्र्ह्व ञ्चठ्ठद्मह्यन्ठ्ठद्दद्ध.ष्oद्व लेखक राज्यसभा सदस्य और जाने-माने अर्थशास्त्री हैं, वे के न्द्र सरकार में सचिव रह चुके हैं।

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