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लोकतंत्र: मंदी के दौर में महंगे चुनाव

अर्थव्यवस्था पर मंदी की मार दिखाई दे रही है, लकिन पंद्रहवें लोकसभा चुनाव में कहीं भी यह मार नहीं है। अर्थ विशेषज्ञों के अनुसार भारत में पंद्रहवीं लोकसभा के चुनाव में चार माह पहले हुए अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव से भी अधिक व्यय होगा। जहाँ अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में नौ हजार करोड़ रुपए खर्च हुए। वहीं भारत में पंद्रहवीं लोकसभा के चुनाव पर कम से कम दस हजार करोड़ रुपए खर्च अनुमानित है। पिछल 2004 क लोकसभा चुनाव मं 4500 करोड़ रुपए खर्च हुए थ। दश मं लगातार बढ़ती हुई मतदाताओं एवं उम्मीदवारों की संख्या, बढ़ती हुई मतदान कंद्रों की संख्या और चुनाव प्रचार अभियान क नए-नए आयामों न लोकसभा चुनावों को लगातार खर्चीला बनाया है। इस बार क लोकसभा चुनाव मं मतदाताओं की संख्या 71 करोड़ 40 लाख है और इनक लिए आठ लाख 28 हजार बूथों पर वोट डालन का प्रबंध किया गया है। अतएव इतन व्यापक चुनाव कार्यक्रम क लिए चुनाव आयोग एवं सरकार क द्वारा चुनाव व्यवस्था संबंधी मदों पर भारी व्यय किया जाएगा। इसमं प्रमुख रूप स करीब 40 लाख शासकीय अधिकारियों और कर्मचारियों और 21 लाख सुरक्षाकर्मियों को चुनाव कार्य मं लगाया गया है। पंद्रहवीं लोकसभा चुनाव क खर्च क बार मं अर्थ विशषज्ञों और चुनाव एजंसियों क द्वारा जो अनुमान प्रस्तुत किए जा रह हैं, उनक आधार पर यह कहा जा सकता है कि इस चुनाव मं चुनाव आयोग व सरकार करीब 4000 करोड़ रुपए व्यय किए जाएंग। राजनीतिक दलों का व्यय, चुनाव मं शामिल उम्मीदवारों क द्वारा चुनाव आयोग क द्वारा निर्धारित आधिकारिक सीमा क तहत व्यय तथा इस आधिकारिक राशि क अलावा इन उम्मीदवारों तथा इनक समर्थकों क द्वारा चुनाव आयोग की पैनी निगाहों स बचत हुए वोट क लिए नोट इन तीनों मदों पर छह हजार करोड़ रुपए स अधिक व्यय होंग। निश्चित रूप स पंद्रहवीं लोकसभा चुनाव क परिप्रक्ष्य मं विभिन्न मदों पर किए जान वाल दस हजार करोड़ रुपए स अधिक क व्यय स अर्थव्यवस्था को तात्कालिक लाभ मिलना है। लोकसभा चुनाव क दौरान जिन विभिन्न चुनाव मदों पर जो व्यय हो रहा है, उसका अधिकांश हिस्सा आम आदमी की जब मं पहुँचकर उसकी क्रयशक्ति बढ़ा रहा है। चुनाव केदौरान कई लोगों को कई कार्यो मं अस्थाई रोजगार मिल रहा है। दश क कोन-कोन मं लोकसभा चुनावों मं खड़ उम्मीदवारों क लिए प्रचार क परम्परागत तरीकों क तहत पोस्टर-बैनर छापन वाल प्रिंटरों की बांछं खिली हुई है। चुनावी प्रचार मं इस्तमाल होन वाल झंड़, बि और बैनर बनान वाल कारोबारी इस मंदी मं भी अच्छी कमाई करत हुए दिखाई द रह हैं। चुनाव क काम मं लग आॉटोरिक्शा, टैक्सी और अन्य वाहनों क मालिकों क साथ-साथ ड्राइवरों की कमाई बढ़ गई है। स्थिति यह है कि चुनावी धन की प्राप्ति क लिए सभी राजनीतिक दलों और अधिकांश उम्मीदवारों क द्वारा चुनाव मं भारी खर्च की आशंका मं उद्योगपतियों, व्यापारियों, भ्रष्ट सरकारी अधिकारियों तथा ठक लन वाल लोगों पर चुनावी चंदा दन का दबाव बनाया जा रहा है। जैस-जैस चुनावों मं व्यय बढ़ता जा रहा है, वैस-वैस चुनावों मं काल धन का प्रवाह बढ़ता जा रहा है। आयकर अधिनियम की धारा 80 जीजीबी के अंतर्गत कंपनियों द्वारा राजनैतिक पार्टियों को चंदा दन का प्रावधान है। चंद केरूप मं दी गई राशि को कंपनी की आय योग्य आमदनी स डिडक्शन मिल जाता है। लकिन चुनावों मं बड़ी संख्या मं उद्यमी-व्यवसायी, नौकरशाह, अवैध व्यवसाय और काली कमाई करन वाल राजनताओं को काला धन दत हैं। जब तक हम चुनाव मं धन का बोल-बाला नहीं रोकंग, तब तक राजनीति तथा आर्थिक सामाजिक जीवन को स्वच्छ नहीं बना पाएँग। जब तक साफ-सुथरी राजनीति नहीं होगी, तब तक दश मं भ्रष्टाचार पनपता रहगा। भ्रष्टाचार ही हमार विकास का धन खा जाता है। क्योंकि राजनताओं क द्वारा लिया गया चंदा और काला धन आर्थिक सामाजिक बुराइयों को बढ़ाता है। जहां चुनाव काल धन को बढ़ात हैं, वहीं चुनावों स विकास भी प्रभावित होता है। कभी लोकसभा चुनाव, कभी विधानसभा चुनाव, कभी नगर निगम-नगरपालिकाओं के चुनाव तो कभी पंचायतों क चुनाव होन स राज्यों मं थोड़-थोड़े समय बाद आचार संहिता लागू होत रहन स विकास प्रभावित होता है। इसकी वजह स एक ओर नीतिगत निर्णय महीनों रुक रहत हैं, वहीं दूसरी ओर बुनियादी समस्याओं क लिए भी लंब समय तक प्रतीक्षा करनी होती है। एस परिदृश्य स दश को बचान क लिए चुनाव प्रक्रिया सुधार लागू किए जान आवश्यक हैं। इसके लिए इंद्रजीत गुप्ता कमटी की सिफारिशों पर ध्यान दिया जाना जरूरी है। निसंदह चुनाव सुधारों की दिशा मं तजी स कदम उठाकर काल धन की वृद्धि तथा खर्चील चुनावों स दश को बचाया जाना चाहिए। लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं।ं

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