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दो टूक

लगता है झारखंड के मंत्री अपने पदों की कोई नयी परिभाषा गढ़ने पर तुल गये हैं। तनख्वाह और तफरीह शगल बन गया है इनका। सूबे की दुर्दशा किसी से छुपी नहीं। केंद्र पिघल गया। प्रधानमंत्री आये घोषणाएं कीं। लेकिन उसे सरामीं पर उतारगा कौन? इन मंत्रियों को मटरगश्ती से फुरसत नहीं। जनता की कौन पूछे, इनके अपने कार्यालय की मेज-कुर्सियां हफ्तों-महीनों दर्शन के लिए तरस जाती हैं। ऐसा नहीं कि ये सब अंतध्र्यान हैं। विदेश यात्रा पर नहीं होते तो दिन-दोपहर-आधी रात नियम-संविधान की धज्जियां उड़ाते कानफाड़ू सायरन वाले शाही वाहन नागरिकों को इनकी उपस्थिति बताते रहते हैं। दो टूक कहें- निरंकुशता और निर्लज्जता भी शरमाने लगी है अब! आखिर ये दर्जन भर महाप्रभु तीन करोड़ की किस्मत पर कब तक ग्रहण बने रहेंगे।

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