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कचर के ढेर पर जवां होते सपने

दीवारों पर ‘स्कूल चलें हम’ अभियान के बड़े-बड़े पोस्टर चस्पां हैं। नीचे कूड़े के ढेर में जिंदगी तलाशी जा रही। स्कूल ड्रस में ही प्लास्टिक की बड़ी सी गठरी कंधे पर लादे ये बरबस ध्यान खींच लेते हैं। गरीबी ने इनसे इनका बचपन छीन लिया है। देखने में भले ये दूसर किसी बच्चे की तरह ही लगते हों, पर करण और रॉकी हैं असाधारण। बाप का साया सिर से उठ चुका है। असहाय मां बच्चों के लिए दो जून की रोटी का जुगाड़ तो किसी तरह कर लेती है, लेकिन बच्चों को पढ़ाना उसके वश में नहीं। स्कूल नहीं भेज सकती। करण और रॉकी यह समझ गये हैं कि बगैर पढ़े-लिखे जिंदगी में कुछ नहीं कर सकते। सो, दोनों ने स्कूल जाने की ठान ली। कचर के ढेर पर जवां होने लगे सपने। अब स्कूल फीस कौन भर? बेबसी के मार इन बेचारों ने इसकी जुगत भी खुद ही कर ली। सुबह पांच बजे उठ कर गली-मुहल्ले के कूड़े-कचरों से प्लास्टिक-पॉलिथीन-कबाड़ ढूंढ़ने निकल जाते हैं। तीन घंटे की जी-तोड़ मेहनत के बाद दिन अगर बहुत अच्छा रहा, तो दोनों भाई 20 से 25 रुपये कमा लेते हैं। दोनों रांची के सामलौंग स्थित निर्मला स्कूल में पढ़ते हैं। रॉकी चौथी और करण तीसरी क्लास में पढ़ता है। खादगढ़ा बस्ती में रहते हैं। रॉकी बताता है-हर महीने स्कूल में 40 रुपये फीस देनी पड़ती है। कमाई अच्छी रही, तो महीने में पाच-छह सौ रुपये कमा ही लेते हैं। इससे पढ़ाई के साथ-साथ घर का खर्च भी निकल जाता है। रॉकी और करण से यह पूछा कि गया घर में पढ़ते कब हो? जवाब था-रात को। उन्हें इस बात का भी मलाल नहीं कि उनकी पढ़ाई का खर्च सरकार नहीं उठाती। बड़े-बड़े दावे करनेवाला शिक्षा विभाग क्या इन दोनों बच्चों के बार में सोचेगा?

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