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स्वभाव के अनुरूप ही चैनलों का चयन

टीवी चैनल देखने के मामले में महिलाओं की तरह अफसरों की भी अलग पसंद है। खासकर सचिवालय में तो अफसरों की पसंद उनके शानदार कक्ष में टीवी चैनलों पर देखी जा सकती है। गृह विभाग और पुलिस मुख्यालय भी इससे अछूता नहीं। अफसर अपनी पसंद के हिसाब से चैनलों का चयन भी करते हैं।चैनलों के चयन में काफी हद तक उनका काम-काज और स्वभाव भी झलकता है। मसलन आईजी स्तर के एक अधिकारी के कक्ष में आप जब जाएं सिवाय प्रवचन-भजन के टीवी पर कुछ और नहीं दिखता। स्वभावत: उनकी रुचि भी मठ-मंदिरों में विशेष है। उनके कक्ष का पूरा माहौल ही भक्ित-भाव वाला है। हालांकि उनका काम भी चुपचाप रहकर कुछ ‘विशेष’ करना है।ड्ढr ड्ढr दूसर अधिकारी हैं एडीजी स्तर के। उनके कक्ष में बड़ी स्क्रीन वाला टीवी सेट है। दरअसल टीवी चैनलों से उनका संवाद भी होता रहता है और कभी-कभी चैनल पर खुद भी दिख जाते हैं। वे उन्हीं चैनलों को पसंद करते हैं जिनपर उनके दिखने की गुंजाइश होती है। न दिखने की सूरत में उन्हें क्रिकेट मैच देखना बेहद पसंद है। तीसर, अधिकारी ऐसे हैं जिनपर बड़ी जिम्मेदारियां हैं। वर्दी वाले भी उनसे हड़कते हैं। राज्य में क्या कुछ हो रहा है उसपर विशेष निगाह रखनी होती है। लिहाजा जब तक वे कक्ष में होते हैं रीजनल समाचार चैनलों पर ही नजर टिकाए रहते हैं। दअरसल उन्हें भी चैनलों की तरह ही अपडेट रहना पड़ता है। चौथे अधिकारी आईजी स्तर के हैं। उनका ‘बुद्धू बक्सा’ तभी खुलता है जब कोई ‘धमाकेदार’ घटना हो जाए। एडीजी स्तर के एक और कड॥कदार अधिकारी हैं जिन्हें टीवी से कोई खास लगाव नहीं। लिहाजा उनके कक्ष का ‘बुद्धू बक्सा’खुलता ही नहीं। दरअसल उनके कक्ष में पहले जो अधिकारी थे उन्हें भी टीवी से कोई लगाव नहीं रहा। अब इसे कक्ष का असर कहिए या फिर वहां बैठने वाले अधिकारियों के स्वभाव का।

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