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अमेरिका को झिड़की

या अमेरिका से प्रगाढ़ता की खातिर ईरान जसे पारम्परिक मित्र देश का साथ छोड़ना भारत के लिए उचित है? जब अमेरिका ने सुझाव दिया था कि ईरानी राष्ट्रपति अहमदीनेजाद की दिल्ली यात्रा के दौरान भारत उनसे परमाणु मामले में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की जरूरतें पूरी करने के कहे तो उसके पीछे शायद उपरोक्त मंशा ही थी। नसीहतें देने व दूसरों के रिश्तों में टांग अड़ाने की अमेरिकी आदत पुरानी है, पर मसला यहीं तक सीमित नहीं। भारत के लिए एक महत्वपूर्ण बात अपनी स्वतंत्र विदेशनीति के संचालन की भी है, इसलिए अमेरिकी सुझाव पर उसने कड़ा ऐतराज जताकर सही राजनीतिक रुख अपनाया है। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि भारत को किसी सलाह की जरूरत नहीं है। विदेशमंत्री प्रणव मुखर्जी ने भी झिड़की के अंदाज में जो कुछ कहा, उससे अमेरिका को समझ में आ जाना चाहिए कि विवादास्पद मसले का हल धौंस-धमकी या सैनिक कार्रवाई से नहीं, बल्कि राजनयिक प्रयासों या संयुक्त राष्ट्र के बैनर तले पहल से ही संभव है। मुखर्जी ने कहा कि ईरान परमाणु हथियार बना रहा है या नहीं, यह तय करने की जिम्मेदारी अमेरिका की नहीं, बल्कि आईएईए की है। जाहिर है कि अमेरिका अंतरराष्ट्रीय पुलिसमैन बनकर अपनी दादागिरी चलाना चाहता है, जिसका भारत ने तीव्र विरोध किया है। इससे संप्रग सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे वामदल तुष्ट-संतुष्ट महसूस करंगे। इसके पहले आईएईए की बैठक में ईरान के खिलाफ भारत के दो बार वोट देने पर सरकार से वामपंथी साथी खफा थे। असली बात, परमाणु अप्रसार पर सही रुख की है, जिसके बार में स्वयं अमेरिका दोहर मापदंड अपनाता रहा है। परमाणु व रासायनिक अस्त्र रखने के आरोप में उसने इराक पर हमला किया था, पर आज तक आरोप साबित नहीं कर पाया है। अमेरिका की खुफिया एजेंसियां 2002-03 में ही बुश प्रशासन को बता चुकी थी कि ईरान ने परमाणु हथियार कार्यक्रम छोड़ दिया है, फिर भी राष्ट्रपति बुश सैनिक कार्रवाई की धमकियां देते रहे। पाकिस्तान के वैज्ञानिक डॉ. खान ने अपने गुप्त परमाणु नेटवर्क के जरिए ईरान, उत्तर कोरिया आदि को जो सामग्रियां भेजीं, उस पर अमेरिका ने सालों तक आंखें फेर ली थीं। इन सामग्रियों का मूल स्रोत यूरोपीय फर्मे थीं। उसने यूरोपीय मित्र देशों के खिलाफ मुंह तक नहीं खोला था। अमेरिका को समझना होगा कि ये दोहरे मापदंड ही परमाणु अप्रसार पहल की नाकामी के सबसे बड़े कारण हैं।ं

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