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दलित चिंतन : अमेरिकापरस्त कैसे हुए अंबेडकर?

यह सब एक खास मकसद से किया जा रहा है और वह है अन्तरराष्ट्रीय पँूजीवाद यानी अमेरिकी पँूजीवाद के पक्ष में अंबेडकर को खड़ा करना। कहा जा रहा है कि डॉ. अंबेडकर भारत को अमेरिका जैसा बनाना चाहते थे। उन्होंने भारत का नाम ‘यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ इंडिया’ प्रस्तावित किया था, जो ‘यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका’ से प्ररित था। उन्होंने अपनी पार्टी के घोषणा-पत्र में चीन के साथ भारत के सम्बन्ध की निन्दा की थी। वे अमेरिका के पैटर्न पर अध्यक्षीय शासन प्रणाली की माँग कर रहे थे और भारत की कृषि व्यवस्था का औद्योगीकरण चाहते हुए बड़े-बड़े फार्मो के पक्ष में थे। ये बहुत भयानक भ्रांतियाँ हैं, जो फैलायी जा रही हैं। निस्सन्देह डॉ. अंबेडकर की रचनाओं में ‘स्टेट्स एण्ड माइनारिटीज’ का बहुत महत्व है, जो संविधान सभा को देने के लिये 1में लिखा गया ज्ञापन-पत्र है। इसमें डॉ. अंबेडकर ने अपने विचारों का संविधान प्रस्तुत किया है। इसकी प्रस्तावना में उन्होंने लिखा है, ‘हम लोग निश्चित करते हैं कि प्रान्त और केन्द्र शासित क्षेत्र और भारतीय रियासतें एक7साथ मिलकर संयुक्त राज्य भारत (यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ इंडिया) नाम से विधायी, कार्यकारी और प्रशासनिक प्रयोजनों के लिये एक राज्य निकाय का गठन करंगे और इस प्रकार निर्मित संघ अविघटनीय होगा।’ यहाँ ‘संयुक्त राज्य भारत’ संयुक्त राज्य अमेरिका से प्ररित नहीं है। शायद उन्हें यह लगा होगा कि देशी रियासतें भारत संघ में विलय के लिये तैयार न हों और अपनी स्वायत्तता के साथ अस्तित्व बनाये रखें। आगे उन्होंने विस्तृत विश्लेषण भी किया है, जिसमें वे कहते हैं कि जो रियासतें संघ में शामिल होंगी और जो संघ में शामिल नहीं होंगी वे ‘संयुक्त राज्य भारत’ के संविधान के अधीन रहेंगी। डॉ. अंबेडकर मानते थे कि संसदीय लोकतंत्र की ब्रिटिश प्रणाली में एक नयी स्थायी सरकार प्रदान करने की क्षमता है, पर उन्हें सन्देह था कि जातिवाद के कारण यह भारत में स्थायी सरकार का निर्माण नहीं कर सकेगी। छोटी-छोटी बातों पर सरकार गिराना आसान हो जायेगा, जो किसी अराजकता से कम न होगा। वे यह भी मानते थे कि भारत में एक साम्प्रदायिक बहुमत भी हमेशा रहता है, जिसका एजेण्डा चाहे जो हो, पर वह अल्पसंख्यकों और विशेषत: दलित वर्गो के लिये खतरा सिद्ध होगा। इसलिये उन्होंने अपने ज्ञापन-पत्र में अमेरिकन मॉडल को अपनाया था, परन्तु उसमें भी उन्होंने भारतीय परिस्थितियों, विशेषकर अल्पसंख्यकों की आवश्यकताओं के मद्देनजर परिवर्तन किया था। इससे यह नहीं कहा जा सकता कि अंबेडकर अमेरिका-परस्त थे, जबकि संविधान सभा में प्रारूप समिति के अध्यक्ष के नाते वे ब्रिटिश संसदीय लोकतंत्र की जमकर वकालत करते हैं। कहना चाहिए कि अमेरिकी मॉडल के प्रति भले ही उनका दृष्टिकोण सकारात्मक था, पर शीघ्र ही वे समझ गये थे कि भारत के लिये संसदीय लोकतंत्र की प्रणाली ही उपयुक्त है। संविधान-सभा में बहस के दौरान उन्होंने स्पष्ट कहा था कि यूनाइटेड स्टेट्स में बहुत सचिवालय होते हैं, जो तमाम प्रशासनिक विभागों का काम देखते हैं, पर राष्ट्रपति उनकी सलाह मानने के लिये बाध्य नहीं हैं। वहाँ राष्ट्रपति कार्यपालिका का प्रधान होता है। किन्तु हम इस पद्धति को नहीं अपना सकते। इसलिये, हमने संसदीय लोकतंत्र को अपनाया है। अगस्त 1में उन्होंने स्वतंत्र मजदूर पार्टी बनायी थी। उसके एक सम्मेलन में उन्होंने जोर देकर कहा था कि इस देश के दलित-मजदूरों के दो शत्रु हैं- ब्राह्मणवाद और पँूजीवाद। इनके विरुद्ध संघर्ष करने से ही उनको अपने दुखों से मुक्ित मिल सकती है। डॉ. अंबेडकर ने आजीवन इन दोनों शत्रुओं के विरुद्ध लड़ाई लड़ी। जिस पँूजीवाद को वे उखाड़ फेंकना चाहते थे, वे उसका समर्थन कभी नहीं कर सकते थे। उन्होंने लिखा कि भारत के तीव्र औद्योगीकरण के लिये राज्य-समाजवाद बहुत जरूरी है। निजी उद्यम यह काम नहीं कर सकते और यदि कर भी सके, तो वे सम्पत्ति की उन्हीं असमानताओं को जन्म देंगे, जिन्हें यूरोप में निजी पँूजीवाद ने उत्पन्न किया है। वे कहते हैं कि उद्योग, भूमि, शिक्षा और बीमा के राष्ट्रीयकरण के साथ सामूहिक खेती की पद्धति लागू होगी और कृषि पर राज्य का स्वामित्व होगा। उन्होंने कहीं भी कारपोरट फार्मिग की बात नहीं की, जैसा कि प्रचार किया जा रहा है। लेखक प्रमुख दलित विचारक व रचनाकार हैं

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  • Web Title: दलित चिंतन : अमेरिकापरस्त कैसे हुए अंबेडकर?