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आत्मशक्ित युक्त हों

वेद में मनुष्य को परमात्मा की सबसे उत्तम रचना बताया गया है। यह इसलिए नहीं कि इंसान का शरीर दूसर जीवों से सुन्दर और अद्भुत है, बल्कि मनुष्य को ही विचार की शक्ित हासिल है। और विचार शक्ित के सहार इंसान इस धरती को बहुत कुछ दे सकता है और दोहन करके सुखी हो सकता है। भौतिक सम्पन्नता के साथ वह बौद्धिक और आत्मिक रूप से पूर्ण बन सकता है। वेद में कहा गया है कि हे मनुष्य! अपने बढ़िया से बढ़िया कर्मो से अपने जीवन को उत्तमोत्तम बनाओ और ऐसी शक्ित अर्जित करो जिससे तुम हर तरह से पूर्ण हो ही, समाज को पूर्णता हासिल हो। इसी पूर्णता की चर्चा वेद के अलावा धर्म की तमाम किताबों में कहानियों के माध्यम से की गई है। महान योगिनी श्री मां और महान योगी श्री अरबिन्द ने कहा है कि मनुष्य का जन्म इसलिए नहीं हुआ है कि वह केवल खाए-पीए और संसाधनों से चकाचक हो जाए, बल्कि उसे आत्मिक विकास के उस स्तर तक बढ़ना है जहां अतिमानस की प्राप्ति हो सके। आत्मिक-शक्ित से भरपूर हुए बगैर इंसान वह उच्चता नहीं हासिल कर सकता जिसके लिए उसका जन्म हुआ है। अथर्ववेद में कहा गया है- हे इंसान! तुम अपने मकसद को हमेशा याद रख। तुम अपने जीवन को अग्नि के समान ऊध्र्वगामी बनाओ। मतलब आत्मिक-शक्ित से ऐसे भरपूर हो जाओ जसे घोड़ा शारीरिक-शक्ित से भरपूर रहता है। हमार ऋषि-महर्षियों ने हमें प्रेरणा दी है कि हे मानव, यदि चाहता है कि यह धरती स्वर्गधाम बने तो सबसे पहले तुम्हें यह हर पल गौर करना होगा कि तुम कभी भी ऐसा कार्य न करो जो तुम्हें कमजोर करती हो। इसमें यह साफ संकेत किया गया है कि हम महा अपने विकास के प्रति ही सचेत न रहें, बल्कि परिवार, समाज और विश्व समाज के प्रति भी निरंतर संवेदित और सजग रहें। हर इंसान विश्व समाज की एक इकाई है। आज व्यक्ित व्यक्ितगत स्तर पर कमजोर हो ही रहा है, समाज, संस्कृति, धर्म और नैतिकता के स्तर पर भी कमजोर हो रहा है। यह हमारी प्रगति की नहीं, अवनति की निशानी है।ं

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