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7वीं क्लास तक नहीं होगी परीक्षा

अब सचमुच होगी मस्ती की पाठशाला। मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय ने सिफारिश की है कि प्राथमिक शिक्षा के स्तर यानि 7वीं क्लास तक किसी भी स्कूली बच्चे को परीक्षा के झंझट से मुक्त रखा जाना चाहिए। यानि 7 वीं तक कोई परीक्षा नहीं। हाल में परीक्षा के दबाब के चलते छोटे छोटे बच्चों द्वारा भी आत्महत्याएं करने के कई उदाहरण आए हैं। यह महत्वपूर्ण सिफारिश इस मंत्रालय द्वारा तैयार शिक्षा का अधिकार बिल, 2008 (राइट टू एजुकेशन बिल,2008) के मसौदे (ड्राफ्ट) में है जिसे इसने तैयार कर योजना आयोग समेत विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के पास भेजा है। कानून बनाने के लिए इसे कैबिनेट में स्वीकृति के लिए पेश किया जाना है। देश में किसी भी सरकारी या निजी स्कूल द्वारा 7वीं क्लास तक के बच्चे की परीक्षा लेना और उसे सिर्फ फेल होने के आधार पर ऊपरी क्लास में जाने से रोकना गैर कानूनी हो जाएगा। पहली परीक्षा 8 वीं क्लास के सत्र के बाद होगी।इस प्रस्तावित कानून के तहत शिक्षकों के लिए यह अनिवार्य होगा कि वे प्राथमिक शिक्षा (6 साल की उम्र से शुरू कर 8 साल की शिक्षा) के कम से कम 5 साल तक छात्रों से उनकी मातृभाषा में उन्हें समझाएं। यह सिफारिश भी उन पब्लिक स्कूलों के खिलाफ जाएगी जहां अंग्रेजी नहीं बोलने वाले छोटे बच्चों के लिए दंड का प्रावधान है। सरकार के इस कदम के पीछे हाल में वर्तमान स्कूली शिक्षा पद्धति के तहत छोटे छोटे बच्चों पर बढ़ रहे दबाब को कम करने की कोशिश है। बहुत ही कड़े शब्दों में राइट टू एजुकेशन बिल,2008 के ड्राफ्ट में एक और बात कही गई है- किसी भी हालत में किसी भी बच्चे को शारीरिक रूप से दंडित करना या उस पर किसी तरह का मानसिक दबाब बनाना पूरी तरह गैर कानूनी हो जाएगा। एसा करने वाले शिक्षकों के लिए कड़े दंड के प्रावधान हैं।

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