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तबादलों का कहर विकास पर

भ्रष्टाचार और धाँधली के आरोपों से जूझ रही विकास योजनाओं का बेड़ा गर्क करने में राज्य सरकार के जिम्मेदारों ने भी कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी। योजनाओं के संचालन के लिए सीधे जिम्मेदार ग्राम्य विकास विभाग के शीर्ष पदों पर साल भर में आधा दर्जन अधिकारियों को ही बदल डाला। आलम यह रहा कि विभाग के आयुक्त और प्रमुख सचिव पद अधिकारी आए और जब तक वे कामकाज से तालमेल बैठा पाते उन्हें चलता कर दिया गया।ड्ढr प्रदेश में मायावती सरकार के गठन के बाद से अब तक मात्र 11 महीनों में मनोज कुमार सिंह चौथे ग्राम्य विकास आयुक्त हैं। उनके पहले आर. के. तिवारी, राजन शुक्ल और एस. आर मीणा इस पदपर रह चुके हैं। विभाग के प्रमुख सचिव पद पर भी तीन अधिकारी बदले जा चुके हैं। जे. एन. चैम्बर चौथे अधिकारी हैं जिन्हें अभी तैनात किया गया है। दूसर राज्यों और केन्द्र सरकार में ग्रामीण विकास से जुड़े विभाग में शीर्ष पदों पर कार्यकाल कम से कम दो से तीन वर्षो का होता है। देश में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना के क्रियान्वयन में अब तक बेहतर साबित रहे आन्ध्र प्रदेश में ग्रामीण विकास विभाग के सचिव पद पर के. राजू 11 साल बिता चुके हैं।ड्ढr विभाग के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने हिन्दुस्तान से कहा कि उच्चाधिकारियों का बार बार बदला जाना भी योजनाओं के प्रभावित होने की एक बड़ी वजह है। गाँवों में बेरोजगारी की गम्भीर समस्या से निपटने के लिए संचालित केन्द्र सरकार की महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना की प्रगति तो बेहद निराशाजनक है ही वहीं दूसरी योजनाओं की हालत भी बेहतर नहीं है। इनमें प्रधानमंत्री ग्राम सड़क परियोजना, इन्दिरा आवास योजना, महामाया आवास योजना, स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना, सम्पूर्ण ग्राम रोजगार योजना, ग्रामीण पेयजल योजना, अम्बेडकर विशेष रोजगार योजना और राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य बीमा योजना सहित विधायक और सांसद निधि से कराई जाने वाले करोड़ों के विकासकार्य शामिल हैं। ये सभी योजनाएँ लगभग सात हजार करोड़ रुपए की हैं।ड्ढr ं

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