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गणेश ने लोहा पीट गढ़े इंजीनियर-मैनेजर

शाबाश! गणेश मिस्त्री। सलाम उस जज़्बे और उसके हाथों को जिन्होंने जिंदगी भर लोहा पीटा और गढ़े मैनेजर, इांीनियर और एमबीए बेटे। 60 साल की बूढ़ी हड्डियों ने जिंदगी में संघर्ष और कामयाबी की कहानी लिखी है। वह आज भी ट्रकों की मरम्मत करते हैं। उनकी मेहनत रंग दिखा रही है। गणेश विश्वकर्मा का बड़ा बेटा ओंकार विश्वकर्मा एसबीआइ हैदराबाद में मैनेजर हुआ है। दूसरा बेटा अभिषेक पुणे से एमबीए कर रहा है। तीसरा अभिनाथ दिल्ली में विदेशी भाषा का ज्ञाता है। चौथा सोनी कुमार इांीनियर बनने की दहलीज पर है। परिवार के बोझ से तो वह खुद पढ़ नहीं पाया, लेकिन इस अधूरेपन को उसने बच्चों की पढ़ाई में पूरा किया। 15 साल की उम्र में छेनी-हथौड़ा थामा था और वह आज भी कायम है। यह दीगर बात है कि अब उसकी मैली-कुचैली गंजी और कमीज कुछ साफ रहने लगी है। वह बताता है कि पिता छुरी-चाकू की दुकान किया करते थे। वह तमाम उम्र गैराज-गैराज भटका है, लेकिन अब जिंदगी में मजा आ रहा है। बच्चे खुशहाल हैं। बुलंदियां छू रहे हैं। मेहनत और लगन की कहानी का नायक गणेश मिस्त्री तो है ही, उसके बच्चे भी इसके बड़े भागीदार हैं, क्योंकि, गंवई प्राइमरी स्कूल से लेकर इस ऊंचाई तक पहुंचने में चारों भाई मिलकर एक-दूसर को सपोर्ट किया है। किराये की कमरों में रहकर खुद खाना बना-खाकर लगातार मेहनत की बदौलत अब सब यह जान गये हैं कि विश्वकर्मा की असली छेनी-हथौड़ी परिश्रम और शिक्षा ही है।

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