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संधि की गांठें

नेपाली संविधान सभा के चुनाव में माओवादी एक नई ताकत के रूप में उभर हैं। नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) को पूर्ण बहुमत नहीं मिला, पर लोकतांत्रिक चुनाव के जरिए वह सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है, जबकि दूसरी सबसे पार्टी नेपाली कांग्रेस को एक-तिहाई से भी कम सीटें मिलीं। यह जनादेश बदलाव के पक्ष में था, जिससे माओवादियों का हौसला बढ़ना लाजिमी है। इसके बावजूद माओवादी नेता प्रचंड का 58 साल पुरानी भारत-नेपाल शांति व मैत्री संधि की समाप्ति की मांग करना अप्रत्याशित कदम नहीं, क्योंकि पिछले 8 साल से वह ऐसी मांग उठाते रहे हैं। चुनावों में भी उन्होंने यह बात कही थी। जाहिर है कि विगत सालों में कई भू-राजनैतिक परिस्थितियां बदल चुकी हैं और प्रचंड संधि की समाप्ति और नई संधि करने की बात कर रहे हैं तो इससे दोनों देशों को फायदे होंगे। यदि नई हकीकतों के मद्देनजर दोनों देश नए प्रावधानों पर विचार कर सहयोग के लिए आगे बढ़ें तो माओवादियों का अहम तो तुष्ट-संतुष्ट होगा ही कि उन्होंने अपनी शर्ते भारत से मनवा लीं। साथ ही, विवादरहित स्थितियों में भारत के लिए काम करना अधिक सहा-आसान होगा। प्रचंड की शिकायत है कि 10 की संधि से भूमिबद्ध नेपाल में पहुंचने वाले शस्त्रों, जिन्सों व व्यापार के प्रवाह में भारत अपने प्रभाव का एकतरफा इस्तेमाल करता है और उससे नेपाली हितों को चोट पहुंचती है। इसे प्रचंड नेपाली संप्रभुता पर अंकुश के रूप में देखते हैं। इसी तरह वे महाकाली व अन्य समझौतों की समीक्षा चाहते हैं। भारत ने नेपाल पर दबदबा कायम करने का प्रयास कभी नहीं किया, पर यदि नए सत्ता प्रतिष्ठान के लोग दोषारोपण का खेल भी खेलने लगें तो नई हकीकतों के मुताबिक और नए प्रावधानों के जरिए सहयोग में कोई र्हा भी नहीं। लेकिन, इसमें दो बातें महत्वपूर्ण हैं- एक, प्रचंड किन नए आधारों पर सहयोग चाहते हैं और दो, नए सत्ता प्रतिष्ठान में सिर्फ माओवादी ही नहीं, नेपाली कांग्रेस व अन्य घटक के विचारों की उपेक्षा करना भी मुमकिन नहीं होगा। प्रचंड चीन व भारत दोनों से मैत्री व सहयोग संबंध चाहते हैं। भारत कह चुका है कि नेपाली सरकार के साथ सभी विवादास्पद मसलों पर वह बातचीत को तैयार है। यह नया माहौल द्विपक्षीय सहयोग को नए धरातल पर ले जाने का दोनों सरकारों को मौका प्रदान करता है।ं

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  • Web Title: संधि की गांठें