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राहुल के हिमायती और चाटुकार

अपने नेताओं की सोच कुल मिलाकर यह है कि-मैं सबसे पहले आता हूं। मेर रास्ते में जो भी आए, उसे हटना ही चाहिए। मेर बाद मेर बच्चे आते हैं। कुनबापरस्ती मेरा धर्म है। अगर बच्चे मेर कहने पर चलें। उनके बाद पार्टी आती है। वह भी तब, जब वह मेरा खयाल रखती हो। अगर पार्टी मेरे बार में नहीं सोचती, तो दूसरी पार्टियां तो हैं ही। मैं उनमें जा सकता हूं। फिर देश है..क्या जरूरत है देश की चिंता करने की? वह खुद अपना बुरा-भला देख लेगा। अभी कांग्रेसी नेताओं में राहुल गांधी को अगला प्रधानमंत्री बनाने की होड़ लगी थी। मैंने जसे ही उसके बार में सुना तो सोचने लगा-अब ये लोग क्या खुराफात करना चाहते हैं? ये लोग सरकार में हैं या उनमें से हैं जो पार्टी का साथ दे रहे हैं। फिलहाल, मनमोहन सिंह उनके प्रधानमंत्री हैं। उन्हें समझना चाहिए कि उनके बयान प्रधानमंत्री की हैसियत को कम करते हैं। किसी पार्टी में जब इस तरह के लोग हों, तो फिर दुश्मनों की क्या जरूरत? मनमोहन सिंह चार-साढ़े चार साल से वह जिम्मेदारी निभा रहे हैं। मेरा ही नहीं और कई लोगों का मानना है कि अगर उन्होंने बेहतरीन काम न सही, लेकिन अच्छा काम तो किया ही है। तब ये लोग जानबूझकर उन्हें परशान क्यों कर रहे हैं? दरअसल, अगले प्रधानमंत्री के बार में कोई बयान आना भी था, तो खुद मनमोहन सिंह की तरफ से आना चाहिए था। वह भी जब उनकी दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने की चाहत ही न हो। या फिर यह बयान कांग्रेस की लीडर सोनिया गांधी की ओर से आना चाहिए था। लेकिन मनमोहन सिंह सारे मसले पर चुप रहे। और सोनिया गांधी ने उन लोगों की चाटुकार कह कर खबर ली। फिर ऐलान भी होना था, तो अलग-अलग राज्यों में कांग्रेस को लीड करने वाले नेताओं का होना था। यों आनेवाले चुनाव के मद्देनजर उनका पूरा फोकस एक शख्स पर होना चाहिए। उसे पूर अधिकार होने चाहिए। ताकि वह अपना एजेंडा बना सके। बीजेपी के हिंदुत्व या राम मंदिर या राम सेतु के एजेंडे के खिलाफ नेहरू-गांधी विरासत को रख सके। उसे अपने काडर पर खास तवज्जो देनी चाहिए। ताकि उन्हें वोट देने वाले पोलिंग बूथ तक पहुंच सकें। फिलहाल, मुझे तो इस रोल के लिए राहुल गांधी से बेहतर कोई नजर नहीं आता। अपनी अहमियत साबित करने के लिए इससे बेहतर मौका उन्हें नहीं मिल सकता। लेकिन तब तक उन्हें प्रधानमंत्री के तौर पर पेश नहीं करना चाहिए। मैं गलत हो सकता हूं। लेकिन मैं कोई चाटुकार नहीं हूं। मैं तो उनकी बेहतरी चाहने वाला हूं। वे गुंबद आपको क्या कोई अंदाज है कि मसिदों के खूबसूरत गुंबदों के भीतर क्या है? मेरा इशारा दिल्ली की जामा मसिद, हुमायुं के मकबरे और आगरा के ताजमहल की ओर है। मैं इस खयाल में था कि उसमें मिट्टी, पत्थर या कहीं बीम का सहारा लिया जाता है और उसे किसी चीज से भरा जाता है। लेकिन मैं गलत था। मैंने पाया कि उस मार्बल कवर के नीचे कुछ भी नहीं है। यों ही एक दिन इसका पता चला। कोई 40 साल पहले मुझे उत्तर प्रदेश सरकार ने आगरा के स्मारकों पर एक ब्रोशर लिखने को कहा। मैंने एक हफ्ता शहर में गुजारा। वहां सिकंदरा के डाक बंगले में रुका। हर दिन मैं अलग-अलग जगहों पर घंटों बिताता। एक यूरोपीय सिमेट्री में गया। वह ताज से भी पहले की बनी थी। उसमें बेगम समरू के पति भी दफनाए गए थे। ऐतमादुल्लाह के गेट के पास मैं एक बाग में गया। वहां बाबर को पहले-पहल दफन किया गया था। बाद में उन्हें काबुल में फिर से दफनाया गया। उसे आराम बाग कहा जाता है। वहां के लोग उसे राम बाग कहते हैं। लेकिन मेरा असल काम तो ताज से जुड़ा था। वहां मैंने कई दिन गुजार। उसके केयरटेकर से मेरी दोस्ती हो गई थी। उसने मुझे कुछ ऐसी जानकारी दी, जिसे लोग अक्सर नोटिस नहीं करते। मसलन, एक दिन वह मुझे गुंबद के ऊपरी ओर ले गया। मैं वहां पहुंच कर हैरत में था। वह तो एक खाली हॉल की तरह था। उसमें हमारी आवाजें गूंजती थीं। मैंने उस सब को एक ब्रोशर में लिखा। लेकिन मेर पास उस ब्रोशर की एक भी कॉपी नहीं है। मुझे यह भी पता नहीं कि उस पर मेरा नाम भी है या नहीं। मैं जानता हूं कि उत्तर प्रदेश सरकार को उस बार में लिखने का कोई मतलब नहीं है। पर अगर किसी के पास वह ब्रोशर हो, तो मुझे गिफ्ट कर दे। मैं उनका एहसानमंद रहूंगा।

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  • Web Title: राहुल के हिमायती और चाटुकार