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साठ साल से हमसफर

अप्रैल, 2008 को ‘हिन्दुस्तान’ ने अपने 72 वर्ष पूर कर लिए हैं, यह लोकप्रिय समाचार पत्र मेरी वर्तमान आयु से बारह वर्ष बड़ा है। मुझे वह दिन अभी तक भलीभांति याद है, जब मैं पांचवीं कक्षा का विद्यार्थी था। अपने माता-पिता के साथ आनन्द पर्वत की पंजाबी बस्ती में रहता था। उस समय इस समाचार पत्र की बिक्री मूल्य कुल पाँच नए पैसे का था। मेर पिता पूर समाचार पत्र को इस प्रकार पढ़ कर मुझे सुनाया करते थे, जसे कि उन्होंने उस समय की दसवीं कक्षा पास की हो। उन्होंने ही मुझे हिन्दी भाषा का यह ‘हिन्दुस्तान’ पढ़ना भी सिखाया। सरल हिन्दी भाषी यह समाचार पत्र युवावस्था तक मेरा अग्रज सहपाठी बना रहा। मेर विवाह के पश्चात् सन् 10 से 1तक मेरा यह अग्रज सहपाठी मुझसे अलग हो गया। मुझे लगा कि मेरी कोई अमूल्य वस्तु किसी ने मुझ से छीन ली है। मैं इस समाचार पत्र के बिना भोजन भी नहीं ग्रहण कर पाता था। मुझे यह समाचार पत्र मेरी पत्नी से भी कहीं अधिक प्रिय लगता था। सन् 1से अब तक यह समाचार पत्र मेर जीवन का एक अनिवार्य अंग बन चुका है। मैं साठ वर्ष का हो गया हूं, किन्तु 72 वर्ष की आयु का यह ‘हिन्दुस्तान’ मुझे अब तक भी युवा रूप में ही दिख रहा है। हिन्दुस्तान टाइम्स लिमिटेड के संस्थापक महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी मेर आदर्श रहे हैं। विशिष्ट एवं आदर्श, महान, हिन्दी भाषी, पत्रकारों का सानिध्य संपादक के रूप में इस पत्र को मिलता रहा। दरिद्र नारायण की सेवा करना ही दिल्ली के दैनिक हिन्दुस्तान का मुख्य उद्देश्य भी रहा है। आम जनता से जुड़े होने के कारण ‘लोकप्रिय राष्ट्रीय-पत्र’ का गौरव भी इस पत्र को मिला है। मैं यदि मानव योनि के सात जन्म और भी धारण कर लूं, तो उस परम-पिता परमेश्वर से यही आशा रखता हूं कि प्रत्येक जन्म काल में हिन्दुस्तान ही मेरा अग्रज वंशज के रूप में, मेरा मार्ग दर्शन करता रहे।ड्ढr किशन लाल कर्दम, बी-524, जे. जे. कालोनी, हस्तसाल रोड, उत्तमनगर, दिल्ली राजनीति में आपराधिक कद राजनीति में आज जिस तेजी से अपराधियों का कद बढ़ रहा है, यह एक लोकतंत्र के लिए खतर की घंटी है। बाहुबल राजनीति में प्रवेश का सबसे सशक्त माध्यम बनता जा रहा है। यह राजनीति में पहुंचने का ‘शार्टकट’ मार्ग है। बड़े से बड़ा अपराध करके भी ये नेता सत्ता के सहार सजा से बचे रहते हैं। नए-नए घोटाले, समाज में बढ़ती गुंडागर्दी और असुरक्षा की भावना यही बताती है कि एक दिन हमारी संसद व राज्यों की विधानसभाएं डाकुओं के बीहड़ से भी अधिक भयावह हो जाएंगी। इस लोकतांत्रिक देश में नेता को गलत कहना भी बेईमानी होगी। जब तक हम मतदाता खुद को दोषी नहीं मानेंगे, समस्या यूं ही बनी रहेगी।ड्ढr नीरा किशोर चौहान, जीटीवी इन्क्लेव, दिल्ली

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