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राजरंग

ा करं भइया, किससे कहें कि आजकल वैल्यू थोड़ा कम हो गया है। पहले अकेले थे। सेंटर के कैबिनेट में स्टेट को रिप्रजेंट करते थे। रांची-दिल्ली आना-ााना लगल था। अभियो लगले है। अब उनके संग एगो आउर नेताजी को भी सेंटर में बैठा दिया है लोग। बस एक से दो क्या हुए, वैल्युए घट गया। अब मन ही मन बोल-बतिया रहे हैं। चार साल से भइया अकेले रसगुल्ला खा रहे थे। अब रसगुल्लवा बंट गया है। का करं सेंटर का, जो चाहेगा वही न होगा। लगता है जल्दिये भोट-भाट का दिन आनेवाला है। सो दिल्ली का लोग भी नफा-नुकसान का अंदाजा लगा कर पुलिस के हाकिम रहे डॉक्टर साहब को दिल्ली खींच लिये। लेबर की लड़ाई करते -करते हियां तक पहुंचे हैं भइया। स्टेप बाइ स्टेप आगे बढ़ते रहे। इन बिटविन कई गो दल बदले, अब स्थिर से नेशनल पार्टी के साथ जम गये हैं। चार साल पहले भाग्य ने साथ दिया और भइया का वनवास खत्म हुआ। लालबत्ती का मजा ले रहे हैं। एक और दाढ़ी वाले बाबा भी मंत्री बने थे, लेकिन कब बने कब हटे पते नहीं चला। पहले अकेले सुख भोग रहे थे। अब दूसर के आने से इसमें खलल पड़ना लाजिमी है। आखिर कहें, तो किससे कहें और क्या कहें।

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