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11 अप्रैल, 2020|12:55|IST

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आमिर क्यों नहीं बोलते

फिल्मों के मार्केटिंग गुरु माने जाते हैं आमिर खान। फिल्में ऐसी ही चुनते हैं,  जो कमाई के मामले में अव्वल साबित हों। और साइन करने से पहले मुनाफे में हिस्सेदारी की शर्त भी जोड़ देते हैं। जाहिर है, ‘पीके’  साइन करने से पहले ही आमिर समझ गए थे कि कुछ अंशों को लेकर बवाल मचेगा। अब जैसे-जैसे हिंदू संगठन बवाल काट रहे हैं,  विरोध कर रहे हैं,  वैसे-वैसे फिल्म में लोगों की उत्सुकता बढ़ रही है और लोग थिएटर की ओर कूच कर रहे हैं। लिहाजा फिल्म का कारोबार बढ़ रहा है। लेकिन क्या कुछ फिल्में महज इसीलिए बनाई जाती हैं कि भावनाओं को भड़काया जाए और कमाई की जाए?  सेंसर बोर्ड की अध्यक्ष ने विवादों के बीच यह साफ कर दिया है कि विवादास्पद अंश फिल्म का हिस्सा बने रहेंगे। तर्क यह कि रचनात्मकता के साथ समझौता नहीं होना चाहिए। जानकारी के मुताबिक,  इसी सेंसर बोर्ड ने फिल्म एंटरटेनमेंट में अब्दुल्लाह के किरदार को लेकर उठे विवाद पर स्टैंड लिया था। पीके पर उठे विवाद में मुस्लिम धर्मगुरु भी हिंदू संगठनों के साथ खड़े नजर आ रहे हैं। वे मानते है कि धार्मिक भावनाओं को आहत नहीं करना चाहिए। यानी स्टैंड उन्होंने भी लिया। लेकिन सेंसर बोर्ड ने नहीं। क्या आमिर ऐसा स्टैंड नहीं ले सकते थे?
कविता सिंह
kavitaa.chauhan@gmail.com


जन-सेवक बनिए

चुनाव आते ही हर उम्मीदवार और हर पार्टी,  दोनों यही दर्शाते हैं कि वे शासक नहीं,  जनता के सेवक हैं। चुनाव के बाद वही विधायक अपने क्षेत्र में नजर नहीं आते हैं। दिखते भी हैं,  तो सम्मान समारोहों में सड़कों, स्कूलों और सामुदायिक भवनों के उद्घाटन और पुर्नउद्घाटन के मौके पर। वे दिखते जरूर हैं जनता के बीच,  पर अपने जन्मदिन के बैनरों व पोस्टरों में। ऊंची से ऊंची कुरसी पर बैठने की लालसा और मंत्री पद पाने की होड़ में ये लगे रहते हैं। ऐसे में, कुछ हिटलर की श्रेणी में आ जाते हैं,  तो कुछ डेंगू के मच्छर की तरह दूसरी पार्टी को डंक मारते हैं। कभी-कभी तो उनकी तुलना किसी हीरोइन से भी की जाती है। अब जनता को भाई नहीं,  बल्कि पीके चाहिए, यानी पक्का कर्मयोगी या परिपक्व कार्यकर्ता या प्रबुद्ध कार्यकर्ता।
राम नैयर,  रोहिणी,  नई दिल्ली

कहानियां सुनाती भाजपा

भाजपा के नेता ने जनता को कुछ कहानियां सुनाईं,  देश के लोगों को बहुत अच्छा लगा। कहानियों में बड़ी क्षमता होती है,  जनता उनमें रम जाती है। जनता जिस वस्तु की मांग कर रही होती है,  कहानी सुनकर वह उस वस्तु को ही भुला देती है। कहानी की इस ताकत को जिस नेता ने पहचान लिया,  उसे झंझटों से मुक्ति मिल जाती है। लेकिन जब जनता का आक्रोश बढ़ जाता है,  तब नेता की कहानियां उस पर असर नहीं डाल पातीं। इसलिए भाजपा नेता सफाई अभियान की नौटंकी का सहारा लेकर जनता को शांत कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि महंगी होती दवाइयों,  टमाटर,  प्याज और आलू के दामों की चिंता छोड़कर जनता चुपचाप कहानियां सुने। काश! यह कला हमारे देश के कांग्रेसी नेता भी सीख लेते,  तो उन्हें कभी हार का सामना नहीं करना पड़ता।
आनंद गोयल, जीटी रोड,  दिल्ली-09

माननीयों के आचरण

लोकतंत्र एक महंगी शासन पद्धति है। संसदीय शासन प्रणाली एक खर्चीली व्यवस्था है। सदन की एक-एक मिनट की कार्यवाही पर लाखों खर्च हो जाते हैं। सरकारी अमला रात-दिन एक करके सदन के लिए जानकारी जुटाता है,  उसकी जानकारी पर कितना अमल हो पाता है,  यह अलग बात है। केंद्र और राज्यों के सदनों की स्थिति आज यह है कि न जाने कितने विधेयक व लोकहित से जुड़े मुद्दे शोर-शराबे और नारेबाजी की भेंट चढ़ जाते हैं। हमारे माननीय संसद सदस्य एक पूरी संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं,  उसके वह नियंता व संवाहक होते हैं। यदि इन्हीं माननीयों के आचरण को लेकर लोगों में संदेह पैदा हो जाए,  तो इस लोकतंत्र और समाज का क्या होगा?
आनंद मोहन भटनागर, लखनऊ,  उत्तर प्रदेश

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