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आदमी में पशु-पक्षियों की जुबान

पशु-पक्षी पालतू न हों तो अक्सर इंसानों से दूर भागते हैं। यूं कहें कि पास फटकने से भी गुरा करते हैं लेकिन आरा के लक्ष्मण इससे इतर हैं। उनके अंदर कई पशु-पक्षियों की जुबान बसी है। नजरों के सामने जानवर व पक्षी दिख जाएं तो एक जुबान पर दौड़े चले आएंगे। ऐसा लगता है जसे उनकी बिरादरी एक जसी है। काफी अर्से की जान-पहचान व जनम-ानम का रिश्ता हो। मौलाबाग मुहल्ले के रहने वाले 45 वर्षीय लक्ष्मण ने कलेक्िट्रएट तालाब के पास बत्त्तखों को एक आवाज दी तो सार ने घेर लिया।ड्ढr ड्ढr फिर क्या था वे बत्त्तखों की जुबान बोल रहे थे और झुंड में आए बत्त्तख अपनी बिरादरी के होने का अहसास कर रहे थे। जानवरों व पक्षियों से जुड़ी यह जुबानी लक्ष्मण की उम्र की 44 वसंत पार होने पर नहीं बल्कि 12-13 वर्ष की अवस्था से है। खांसने के वक्त निकली आवाज ने इनके अंदर जानवरों की जुबान बोलने का जज्बा पैदा किया। पान बेचकर परिवार की आजीविका चलाने वाले लक्ष्मण के जानवरों की जुबान में भोजपुरी भाषा बोलना खासी विशिष्टता है। बिल्लियां, कुत्ता, कुत्ते के बच्चे, नेवला, सांप, बरसाती मेंढक, बंदर, सूअर, बकरी व गाय की बछिया इनकी आवाज पर सुर में सुर देते हैं तो बत्त्तख, तोता, मैना, पंडुक, कबूतर, मुर्गी, कौआ व मोर भी ताल से ताल मिलाते हैं। जानवरों व पक्षियों के अलावा टमटम की चाल, गांवों में चलने वाले मिल भी इनकी जुबान में सन्निहित हैं।

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  • Web Title: आदमी में पशु-पक्षियों की जुबान