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सूबे में हो सकता ‘अंधेरा कायम’

बिहार पर बिजली संकट की काली छाया मंडराने लगी है। एनटीपीसी के बिजलीघरों के समक्ष कोयले के संकट का असर बिहार पर पड़ना तय है। बिहार बिजली बोर्ड का कांटी बिजलीघर कोयले की कमी के कारण पहले ही ठप हो चुका है। एनटीपीसी के पूर्वी क्षेत्र के कहलगांव, फरक्का और तालचर बिजलीघरों का कोयले का ‘स्टॉक’ तेजी से खत्म होता जा रहा है। जहां कहलगांव और फरक्का के पास महज एक सप्ताह का ही स्टाक बच गया है वहीं तालचर के पास दिनों का सुरक्षित स्टाक शेष है। इन तीनों बिजलीघरों में बिहार की हिस्सेदारी है। उधर कोयले की कमी के कारण बिहार पर आसन्न खतरों के मद्देनजर बिहार के ऊर्जा मंत्री रामाश्रय प्रसाद सिंह ने वरीय अधिकारियों से बात की और उनसे अद्यतन रिपोर्ट तलब की है। पिछले दिनों एनटीपीसी ने कोयले की कमी के कारण देश के विभिन्न बिजलीघरों में उत्पादन में भारी कटौती की है।ड्ढr ड्ढr पूर्वी क्षेत्र के बिजलीघरों के तेजी से खत्म होते स्टाक से यह संभावना उत्पन्न हो गई है कि यहां भी बिजली उत्पादन पर ब्रक लग सकती है। इस समय केन्द्रीय प्रक्षेत्र से बिहार को 1170 मेगावाट बिजली का कोटा निर्धारित है। इसमें से 800 मेगावाट से अधिक बिजली एनटीपीसी के इन तीन बिजलीघरों से ही मिलती है। कटौती होने की स्थिति में बिहार का संकट में पड़ना निश्चित है। एनटीपीसी के एक अधिकारी के अनुसार कोयला संकट की स्थिति राष्ट्रीय स्तर पर है और इसे निपटाने के प्रयास चल रहे हैं। पिछले वर्ष भी कोयले की कमी के कारण एनटीपीसी के विभिन्न बिजलीघरों में बिजली की आपूर्ति काफी कम हो गई थी और बिहार जबरदस्त बिजली संकट की चपेट में पड़ा था। तब कोयले की कमी की वजह से संकट से परशान बिहार बिजली बोर्ड के अध्यक्ष स्वपन मुखर्जी अपनी फरियाद लेकर ‘दिल्ली’ तक दौड़ आए थे। इस वर्ष कोयले की कमी की सूचना से बिहार के होश उड़े हुए हैं। एक ओर भीषण गरमी, दूसरी ओर बिजली कटौती की आशंका बिहार को परशान कर रहा है। बिहार की परशानी इसलिए भी अधिक है कि यूआई चार्ज के तहत वह पीक आवर में अधिक बिजली नहीं ले सकता, क्योंकि इसके लिए प्रति यूनिट दस रुपए तक उसे खर्च करने होंगे।

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