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मार्केट के हिसाब से नहीं बनीं मैथिली फिल्में

एक्िटंग की डिग्री लेकर फिल्म निर्माण में कूदे संतोष शांडिल्य की राय में आज तक बनी मैथिली फिल्में इसलिए पिटीं क्योंकि वे मार्केट के हिसाब से नहीं बनायी गयी थीं। वे पूरी तैयारी के साथ फिल्म बना रहे हैं। पहले ही मार्केट का सव्रे करा लिया है। उन्हें पूरी उम्मीद है कि उनकी पहली मैथिली फिल्म जय अम्बे गौरी लोगों को पसंद आएगी। उनकी दूसरी फिल्म की भी तैयारी अभी ही कर ली गयी है। यह फिल्म मैथिली, भोजपुरी व हिन्दी में हो सकती है।ड्ढr ड्ढr शुक्रवार को अपनी पहली फिल्म के निर्माण की घोषणा करने पटना पहुंचे संतोष ने ‘हिन्दुस्तान’ से बातचीत करते हुए कहा कि मैथिली उनकी मातृभाषा है इसलिए सबसे पहले इसी भाषा में फिल्म बनाने की ठानी। दिल्ली के अपने साथियों के साथ मिलकर यह फिल्म बना रहे हैं। फिल्म का फाइनेंस भी मित्रों द्वारा किया जा रहा है। वे कहते हैं कि आज तक आयी गिनती की मैथिली फिल्में बाजार के मुताबिक नहीं बनायी गयी थीं। मार्केट का कोई विजन नहीं था। मधुबनी व दरभंगा तक ही फिल्म को सीमित कर दिया गया था। लोगों की क्या पसंद है। लोग किस तरह की मैथिली फिल्म देखना चाहते हैं। इन बातों का कोई ख्याल नहीं रखा गया। मिथिला विश्वविद्यालय से पीजी कर चुके संतोष ने हिमाचल प्रदेश के एक संस्थान से एक्िटंग का कोर्स किया। एनएसडी के वर्कशाप में भी काम किया। एक मैथिली फिल्म ‘सिंदूरदान’ में काम किया। एवार्ड से नवाजी गयी मिथिला पेंटिंग पर बनी डाक्यूमेंट्री फिल्म ‘नैना जोगी’ में सह निर्देशक थे। मधुबनी में काफी दिनों तक थिएटर भी किया। इस दौरान यात्रा संस्था बनायी।

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