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टिकट कटने के पीछे राजनीतिक निहितार्थ

आम चुनाव में दिल्ली ही नहीं बाकी राज्यों में भी कांग्रेस ने नफा-नुकसान का आकलन करके ही जगदीश टाइटलर व सज्जन कुमार की टिकट काटने में ही भलाई समझी। कांग्रेस के लिए पंजाब ऐसा अहम राज्य है जहां उसे इस बार अकाली दल को मात देने का पूरा भरोसा था। टाइटलर व सज्जन के टिकट काटकर क्या कांग्रेस दोबारा पंजाब फतह करने में सफल हो पाएगी? यह तो आने वाला वक्त तय करगा। जाहिर तौर पर कांग्रेस ने दिल्ली के दो महारथियों के टिकट छीनकर यही संदेश देने की कोशिश की है कि वह 1में सिखों के कत्लेआम से आहत लोगों के जज्बातों को समझती है। कांग्रेस की ओर से अकाली-भाजपा मुहिम का जवाब देने के लिए गुजरात से लेकर बाकी एनडीए शासित राज्यों के नरसंहारों का हवाला देकर विपक्ष के अभियान को ठंडा करने की आक्रामक रणनीति बन चुकी है। लेकिन कांग्रेस की रणनीति उसे डैमेज हुए वोटों का मुआवजा दिला पाएगी, इसका नमूना पंजाब, हरियाणा व दिल्ली समेत उन कई राज्यों की सीटों के समीकरणों पर निर्भर करगा, जहां सिख मतदाता निर्णायक संख्या में हैं। हालांकि कांग्रेस नेताओं का दावा है कि अब वह भाजपा पर भारी पड़ेंगे लेकिन हार को हरिनाम का जाप सुनने के लिए सवा माह इंतजार तो करना ही होगा। उधर, दिल्ली की राजनीति के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि जब लोकसभा चुनाव में प्रत्याशी के नाम की घोषणा होने के बाद उसका टिकट काट दिया गया हो। भाजपा इसे बोनस प्वाइंट मान रही है। ऐसा होने से दिल्ली में भाजपा के कार्यकर्ता खुश, जबकि कांग्रेस के कार्यकर्ता कुछ उदास दिखाई दे रहे हैं। आगामी 7 मई को राजधानी की सात सीटों पर होने वाले लोकसभा चुनाव में इसका क्या असर पड़ेगा, यह तो समय ही बताएगा लेकिन इतना जरूर है कि जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार का टिकट कटने से चुनावी समीकरण बदल सकता है। खास बात यह है कि कांग्रेस के जो कार्यकर्ता गुरुवार की दोपहर तक दोनों प्रत्याशियों के साथ चुनाव प्रचार में दिल से जुटे हुए थे, वे दूसर के साथ भी उसी उत्साह से जुट पाएंगे, यह कहना जल्दबाजी होगा। दक्षिण दिल्ली की सीट पर तो कांग्रेस दिल्ली के ही किसी अन्य जाट या गुर्जर नेता के नाम की घोषणा कर सकती है, लेकिन उत्तर-पूर्वी दिल्ली की सीट पर प्रत्याशी का चयन करना कांग्रेस के लिए टेढ़ी-खीर साबित हो सकता है। यह भी हो सकता है कि इसके लिए एक-दो अन्य सीटों पर प्रत्याशियों का फेरबदल कर दिया जाए। चुनाव के ऐन मौके पर कांग्रेस का यह कदम भाजपा के लिए बोनस प्वाइंट माना जा रहा है।

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