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हॉकी को हांकता ‘खिलाड़ी’

खेलों को लेकर शर्मसार तो हम कई बार हुये हैं। इसलिये ज्योतिकुमारन द्वारा स्टिंग आपरशन के दौरान रिश्वत लेते देखना ज्यादा चौंकाता नहीं है। मामला सबने देखा कि ज्योतिकुमारन हाकी टीम में एक खिलाड़ी को रखने के लिये मोटी रकम स्वीकार कर रहे हैं। हाय तौबा मची। मामला संसद में गूंजा। लेकिन अब सब टांय टांय फिस्स हो गयाहै।ज्योतिकुमारन बेशर्मी के साथ दहाड़ रहे हैं कि उन्हें फंसाया गया है। हाकी फेडरशन के अध्यक्ष के.पी.एस. गिल की मूंछों पर बल नहीं पड़े हैं। वे अपनी अध्यक्षी पर कुंडली मार बैठे हैं। वैसे तो हमेशा यह कहा जाता रहा है कि क्रिकेट के आगे अन्य खेलों पर तवज्जों नहीं दी जाती है। तरह तरह के रुदाली विलाप रहे हैं। लेकिन यह उस खेल का मामला है जो इसी देश की धरती में पला बढ़ा है। हाकी का हमारा गौरवमय इतिहास रहा है। आठ बार हम ओलम्पिक में गोल्ड मैडल जीत चुके है। इस रकार्ड को तोड़ने की कोई गुस्ताखी नहीं कर सका है। लेकिन कुमारनों के चलते अब हमारी यह हालत हो गई है कि ओलम्पिक में प्रवेश करने के लिये हुये क्वालीफाइंग मैचों में भी हम नहीं जीत पाये और इस बार बीजिंग में तिरंगा लिये हाकी टीम नदारद होगी। वैसे पाठकों की इस बात में दिलचस्पी हो सकती है कि आखिर ये ज्योतिकुमारन हैं कौन? कभी तमिलनाडु में वे हाकी खेला करते थे। उन्होंने हाकी में कभी कोई करिश्माई काम नहीं किया। इसलिये उन्हें एक बेहतर हाकी खिलाड़ी के रूप में कभी भी नहीं जाना गया। 1में वे पहली बार हाकी की छोटी सी दुनिया में सुर्खियों में आये। यह वह वक्त था जब ज्योतिकुमारन हाकी फेडरशन के चुनाव में के.पी.एस. गिल के लिये दक्षिण के वोटों को जुटाने का लिये ठेका लिये हुये थे। इसी ठेके का परिणाम था कि वह भी गिल के साथ धक्के में फेडरशन के महासचिव चुन लिये गये। फिर क्या था गिल और ज्योतिकुमारन हाकी को अपनी तरह से हांकने लगे। कोई भी मौका ऐसा नहीं छोड़ा जिसमें उन्होंने हाकी को शर्मसार न किया हो। कुमारन गिल की शह पर इतने मजबूत होते गये कि वह सेलेक्टरों से लेकर खिलाड़ियों तक को अपने जेब में रखने लगे। खिलाड़ियों को फील्ड पर डांटना, फटकारना उनकी आदत का हिस्सा था। जोड़ तोड़ में उनकी महारत है। व्यापारी मानसिकता उनके खून में है। इसलिये जब भी मौका आता वह हाकी के नाम पर धंधा कर लेते। मैच फिक्िसंग के उनके ऊपर आरोप हैं। लीग बेस्ड टूर्नामेंटों में उन पर मिली भगत के आरोप लगे हैं। वैसे तो खिलाड़ियों को चुनने के लिये एक सेलेक्शन कमेटी है। उसके अध्यक्ष गिल साहब हैं। लेकिन चयन का एक रास्ता ज्योतिकुमारन से हो कर भी जाता है। सेलेक्टरों पर उनका इतना दबदबा है कि वह उन्हें अपनी कठपुतलियों से अधिक कुछ नहीं समझते हैं। बताया यह भी जाता है कि उनकी कई होटलों में हिस्सेदारी भी है। खबर यह भी है कि बीते एक डेढ़ साल से गिल और ज्योतिकुमारन के रिश्तों में दरार पड़ गई है। कहने वालों को कौन रोक सकता है। हाकी और इन दोनों को नजदीक से जानने वालों का कहना है कि प्रयोजकों और उनसे मिलने वाली रकम को लेकर दोनों के बीच तकरार चल रही है।

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