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सब कुछ ठीक हो जाएगा

बीआरटी पर जिस तरह से कैम्पेन चल रहा है, उसमें आपका पक्ष देखने-सुनने को क्यों नहीं मिला? कभी किसी ने मेर से बात करने की कोशिश ही नहीं की। मैं दिल्ली आईआईटी में हर वक्तउपलब्ध हूं, इसके बावजूद मेरा पक्ष जानने की लगता है कि किसी को फुर्सत ही नहीं है। प्रोजेक्ट को लेकर मानो कि यह सब हमार खिलाफ कोई अभियान चल रहा हो। सभी कह रहे हैं कि बीआरटी प्रोजेक्ट के बाद उस पट्टी पर ट्रैफिक पूरी तरह से चरमरा गया है।क्या ऐसी बात भी नहीं है? कौन कहता है यह बात? आप जरा मेर साथ चलिए तो सही। साइकिल सवारों और बस में यात्रा करने वालों से पूछिए कि क्या उन्हें पहले दिन के बाद कोई दिक्कत हो रही है? अंबेडकर नगर से लेकर जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम पर आप कार या बस से 35 और 20 मिनट में पहुंच रहे हैं। हमने खुद कई बार ऐसा करके देख लिया है। पर हमारी बात को सुनने के लिए कोई तैयार नहीं है। तो आप अपनी स्थिति को क्यों नहीं सामने रख रहीं? सुनने के लिए कौन हमारे पास आ रहा है। हमें तो विलेन के रूप में साबित किया जा रहा है। जिन पत्रकारों को ट्रैफिक मैनजमेंट की कोई समझ नहीं है, वे हमें पढ़ा रहे हैं। अगर ऐसी बात है तो वे खुद आ जाएं हमार स्थान पर आईआईटी में। लोकतांत्रिक देश में इस तरह मीडिया का रवैया वास्तव में हैरान कर रहा है। यह तो नेचुरल जस्टिस के भी खिलाफ है। हमारा पक्ष जाने वगैर ही हमें फांसी पर लटकाया जा रहा है। अब यह मांग भी जोरदार तरीके से उठाई जा रही है कि पूर बीआरटी प्रोजेक्ट को ही रद्द कर दिया जाए? इससे बड़ा कोई मजाक नहीं हो सकता कि इस सारे प्रोजेक्ट को ही खत्म कर दिया जाए। अभी तक बीआरटी प्रोजेक्ट पर 100 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। क्या इतने बड़े प्रोजेक्ट को सिर्फ इसलिए ही खत्म किया जा सकता है क्योंकि कुछ लोगों को यह रास नहीं आ रहा है। ऐसे लोगों के दिमागी दिवालिएपन पर मैं सिर्फ सहानुभूति ही व्यक्त कर सकती हूं। अब आपकी नार में हल क्या है? एक बात समझ लें कि अभी हमने बीआरटी का ट्रायल रन शुरू किया है। सब कुछ नया है। हमारे देश में बीआरटी प्रोजेक्ट पहली बार आया है। शुरू में कुछ दिनों तक हो सकता है कि कुछ लोगों को परशानी आई हो पर आगे चलकर सब कुछ ठीक हो जाएगा, ऐसा हमारा यकीन है। अगर यह प्रोजेक्ट इतना ही खराब होता तो हमारी नेशनल अर्बन ट्रांसपोर्ट पॉलिसी में इसे लागू करने की बात न होती। वर्ल्ड बैंक मेट्रो रल प्रोजेक्ट को फंड नहीं करता पर बीआरटी को फंड करने के लिए तैयार रहता है। बीआरटी प्रोजेक्ट को कई और भी देशों ने अपने यहां पर लागू किया है। उन देशों में इसका किस तरह का रिस्पांस रहा है? बहुत बढ़िया रहा है। पर भारत के विपरीत कहीं इसे शुरू होने के चंद दिनों के बाद ही खत्म करने की किसी ने मांग नहीं की। हमारे देश के भी कुछ और शहरों में भी इस पर काम हो रहा है। जरा बताएं कि किन शहरों में बीआरटी प्रोजेक्ट पर काम शुरू हो चुका है? पुणे, अहमदाबाद, राजकोट और जयपुर में इस पर शुरुआती दौर का काम चल रहा है। मुझे अफसोस इस बात का है कि दिल्ली में जिस तरह से हंगामा मचाया जा रहा है ट्रायल रन के दौरान ही, इसके चलते इन शहरों के लोगों के मन में भी बीआरटी को लेकर गलत धारणा बनेगी। अब चडीगढ़, लखनऊ तथा कानपुर जसे शहरों में ट्रैफिक बढ़ता ही जा रहा है। आपकी नार में क्या हल है, छोटे शहरों में यातायात की गम्भीर होती समस्या का? मैं मानती हूं कि जब तक हम बड़े या छोटे शहरों में साइकिल चालकों और सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को चुस्त नहीं बनाएंगे तब तक हम यातायात की समस्या से निजात नहीं पा सकेंगे। हमें फिर से साइकिल चलाने की लिए लोगों को तैयार करना होगा। उसके बिना बात नहीं बनेगी।

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