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अस्पतालों में इनसान की हैसियत

बात ताज्जुब की है लेकिन अच्छी भी कि बाँदा के एक गाँव की गरीब दलित महिला माया देवी और उसके सद्य:जात शिशु की कानपुर के सरकारी अस्पताल के डॉक्टरों की उपेक्षा से हुई मौत पर बावेला मचा। नौ डॉक्टर सस्पेण्ड हुए और जाँच भी बैठाई गई। आमतौर पर सरकारी अस्पतालों और डॉक्टरों की उपेक्षा से गरीब-गुरबे मरते रहते हैं और किसी के कान पर जूँ नहीं रंगती। बावेला तभी मचता है जब किसी विधायक या मंत्री के सर्दी-ाुकाम के इलाज में कसर रह जाती है या नेताजी को पहचानने में भूल के कारण डॉक्टर साहेब कुर्सी से उठकर पंजे के बल खड़े नहीं हो पाते। तभी डॉक्टर मार खाते हैं और सस्पेण्ड होते हैं। मायादेवियाँ तो अक्सर अस्पताल के बाहर फुटपाथ पर प्रसव को मजबूर होती हैं। जच्चा-बच्चा दोनों या कोई एक बच गया तो उनकी किस्मत।ड्ढr कानपुर के सबसे बड़े अपर इण्डिया मेटरनिटी सेण्टर के एक वरिष्ठ और आठ जूनियर डॉक्टरों के सस्पेन्शन से लेकिन क्या हो जाने वाला है। जसी भी जाँच रिपोर्ट होगी, वे देर-सवेर बहाल हो जाएँगे- जसा कि आम तौर पर सरकारी तंत्र में होता रहता है। सोचने की बात यह है कि क्या फिर ऐसा नहीं होगा या प्रदेश के किसी बड़े शहर और कस्बे में ऐसे हादसे नहीं हो रहे होंगे। कितने किस्से मीडिया तक पहुँच पाते हैं? यह सिर्फ संयोग नहीं कि मायादेवी और उसके नवजात शिशु की दुखद मृत्यु के ठीक दूसर दिन कानपुर ही के झींझक कस्बे में एक और गर्भवती महिला किरन को मेटरनिटी सेण्टर में भर्ती करने से इनकार कर दिया गया। प्रसव पीड़ा से तड़पती किरन ट्रेन में बैठी ताकि कानपुर के बड़े अस्पताल पहुँच सके। ट्रेन ही में उसने एक बच्ची को जन्म दिया। उनका भाग्य कि दोनों बच गए। इससे साबित हो जाता है कि मायादेवी को तत्काल भर्ती करने की बजाय अस्पताल से खदेड़ देना अपवाद की तरह नहीं था। ‘हेल्थ वाच’ के सव्रेक्षण में 10 जिलों में एक साल में ऐसे 72 मामले सामने आए थे।ड्ढr सवाल है कि क्यों होता है ऐसा? क्या सिर्फ डॉक्टर ही दोषी हैं और अगर वे इतने संवेदनहीन हो गए हैं तो क्यों हो गए हैं? मायादेवी को अगर तत्काल भर्ती कर लिया जाता तो शायद वह और उसका बच्चा दोनों बच जाते लेकिन इस मामले में नौ डॉक्टरों को सस्पेण्ड करने वाले महानुभाव क्या यह भी देख रहे हैं कि उन्होंने सरकारी चिकित्सा तंत्र को इस लायक बनाया भी है कि वहाँ हर मरीा को अमीर-गरीब और प्रभाव के भेदभाव के बिना तुरन्त और अच्छा इलाज मिल सके? मायादेवी और किरन को मेटरनिटी सेण्टरों से दुत्कारा ही इसलिए गया कि वास्तविकता में यह व्यवस्था उनके लिए बनी ही नहीं है। राजधानी लखनऊ से लेकर कानपुर, आगरा, बनारस, मेरठ, बरली जसे शहरों के बड़े-छोटे सरकारी अस्पतालों में कभी भी देख लीजिए कि वहाँ किस तरह वी आई पी मरीाों की आवभगत होती है

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