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नई संधि के लिए तैयार हैं भारत-नेपाल के मानस

सन 50 की भारत-नेपाल संधि की जगह नई संधि करने के लिए दोनों देशों के नीतिनिर्धारक मानसिक तौर पर तैयार हो रहे हैं। नेपाली माओवादी नेता प्रचंड के ताजा बयान पर सरकारी स्तर पर किसी तरह की नकारात्मक टिप्पणी नहीं आई है। माओवादी और नेपाल के कई संगठन काफी पहले से इस संधि को असमानतामूलक संधि मानते आ रहे हैं। सातवें-आठवें दशक से ही वहां इस पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। नए माहौल में इस पर बहस तेज हुई है। नेपाल-मामलों के विशेषज्ञ भारतीय कूटनीतिज्ञों ने भी इस बहस पर फिलहाल किसी तरह की घबराहट नहीं दिखाई है। प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह के विशेष दूत और पूर्व विदेश सचिव श्याम सरन ने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि इस मुद्दे पर भारत क ो किसी तरह की आपत्ति होगी। नेपाल में भारत के पूर्व राजदूत के.वी. राजन ने एक कदम आगे बढ़कर कहा कि नेपाल अगर पुरानी संधि के बदले नई संधि चाहता है तो उन्हें विश्वास है कि इस मुद्दे पर भारत सरकार का रवैया सकारात्मक होगा। जेएनयू में अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन संकाय के अध्यक्ष प्रो. पुष्पेश पंत ने इस मुद्दे पर हिन्दुस्तान से कहा कि सन 50 की संधि की समीक्षा या उसकी जगह नई संधि की बात से वह पूरी तरह सहमत हैं। जब यह संधि हुई, तब से दुनिया काफी बदली है। बदले माहौल में भारत को नई संधि के लिए तैयार रहना चाहिए। अपने देश में लोगों क ो प्रचंड के इस बयान पर गौर करना चाहिए, जिसमें उन्होंने भारत-नेपाल रिश्तों को नए सकारात्मक और रचनात्मक धरातल पर ले जाने की बात कही है। इस बीच, राजधानी के सियासी हलकों में यह सवाल जरूर गरमाया है कि संविधान सभा और साझा सरकार के गठन से पहले ही प्रचंड ने 50 की संधि पर यह बयान क्यों दिया।़ वैसे भी यह एजेंडा माओवादी-घोषणापत्र का हिस्सा है। कई अन्य दल पुराने समझौतों की जगह ज्यादा सुसंगत समझौता किए जाने की वकालत करते रहे हैं। यह सारी बातें बाद में उठनी ही थीं, अभी उठाने की क्या हड़बड़ी थी।

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