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फर्क कोण से कांग्रेस पर विचार

भारत के राजनैतिक आकाश में इन दिनों बड़े पैमाने पर पंतगबाजी चल रही है। चुनावी हवा का रुख भाँपने के लिए संप्रग तथा राजग, दोनों के महत्वाकांक्षी नेता लटई-डोर संभाले हुए छत (या रायसीना हिल) पर खड़े अपने प्रिय मीडिया की मार्फत अपनी अपनी पतंगें वायुमण्डल को थाहने लिए हवा में उड़ा रहे हैं। लेकिन राजनीति भी ग्लोबल मौसम की ही तरह अनिश्चित बन चुकी है। और ऐसे अफरातफरी भर माहौल में, सामान्य पाठक-दर्शक को भी प्राय: समझ में नहीं आ रहा है कि मीडिया में चल रही कौन सी ताजा खबर सिर्फ खबर है, और कौन सी पार्टी-विशेष का हित साधने वाला कदम? एक बात साफ दिखती है, कि एकदम नए तंत्र का आग्रह पतंगबाजों के किसी भी दल में नहीं है। जब तंत्रनाश या तंत्र परिवर्तन की गुंजाइश न बची हो, तो तंत्र शुद्धि की ओर ध्यान जाना स्वाभाविक है। और तंत्रशुद्धि या उसका आभास देना कांग्रेस का भारी स्पेशलाक्षेशन तब से रहा है, जब से 1े (आवडी) अधिवेशन में कांग्रेस ने (साम्यवादियों का) समाजवादी नारा अपने लिए उठा कर अपनी किश्ती लोकप्रियता की लहर में डाल दी थी। आज दलितों-ानजातियों के बीच घूमते राहुल और नरगा को बढ़ाती कांग्रेस अध्यक्षा क्रमश: बसपा और वाम के मुद्दों को कांग्रेसी एजेंडा बतलाकर फिर उसी दिशा में पार्टी को ले जा रहे हैं। कांग्रेसियत भले ही एक स्थायी सांस्कृतिक चीज हो, पर गठाोड़ के साथ राज-काज चलाना एक चतुर इांीनियरिंग से कृत्रिम इमारत गढ़ने की तरह है, जिसे स्थिर रखने के लिए हाार तरह के समझौते और संतुलन साधने पड़ते हैं। लिहाजा पार्टी तंत्र के अलावा कांग्रेसी प्रधानमंत्री का रोल भी गौरतलब बनता है। सत्ता में वे दो धरातलों पर जीते हैं। एक : जो उनके निजी व्यक्तित्व और विचारों से बना है, दूसरा वह, जो पार्टी का घोषित अजंडा बनाता है। दक्षिण दिल्ली का चुनाव हारने के बाद भी अन्तमरुखी और किताबों की दुनिया में खोए हुए मनमोहन सिंह को जब बरास्ते राज्यसभा नृसिंह राव सरकार के वक्त में हठात् वित्तमंत्री के पद पर बिठाया गया, तो शायद किसी ने (शायद स्वयं उन्होंने) भी कल्पना नहीं की थी, कि देश की अर्थनीति के संदर्भ में उनका यह कार्यकाल इतना महत्वपूर्ण और दूरगामी असर वाला होगा। डॉ. मनमोहनसिंह ने स्वीकार किया है कि ऑक्सफोर्ड की शिक्षा-दीक्षा तथा कांग्रेस के नेताओं (नेहरू, इंदिरा और राजीव) का उन पर गहरा प्रभाव पड़ा है। इस प्रभाव ने उनके दर्शन और जीवन को जनकल्याण से तो जोड़ा लेकिन बड़े रौबदाब वाले परिसरों में बड़े रौबदाब वाले बुजुर्गो के साए में पले अधिकांश लोगों की ही तरह, वे बौद्धिक और निर्णय क्षमता को लेकर सक्रिय राजनीति में जितने आत्मनिर्भर और आक्रामक बन सकते थे, नहीं बने। मूलत: राजनेता बनने से पूर्व वे कांग्रेस की मूल समाजवादी आर्थिक थीसिस की एक एंटीथीसिस नजर आते रहे, लेकिन सत्ता से जुड़ने के बाद तमाम ईष्र्यालु खुर्राट पुराने कांग्रेसियों के तमाम चिड़चिड़ा देने वाली दुरभिसंधियों के बावजूद उन्होंने अपनी छवि की अलग बैंडिंग करने की चेष्टा नहीं की। पुराने कांग्रेसी अगर बाएँँ खींचते, तो मनमोहन उन्हें दाएँ खींचते थे पर बिना खटास के। इस तमाम खींचातानी में कांग्रेस की कितनी प्रगति हुई और मनमोहन सिंह की मूल आर्थिक अवधारणाओं पर किस हद तक लगाम लगी, यह एक अलग बहस का विषय है। लेकिन सचाई यह है कि 2004 तक आते-आते कांग्रेस तथा मनमोहन सिंह, दोनों इस खींचतान के रिश्ते के काफी हद तक आदी हो चुके थे। और बतौर वित्तमंत्री और फिर प्रधानमंत्री, वे जब देश में नेहरू युग से यू-टर्न कराने वाली नई आर्थिक नीतियों के सबसे बड़े प्रवक्ता और प्राथमिक टीचर बने तो देश के लोगों की अर्थशास्त्र की समझ तो धीमे-धीमे कई गुना बढ़ गई, लेकिन खुद डॉ. सिंह की अकादमिक प्रतिभा की बाढ़ मारी गई। अब खर यह अलग बात है, कि (डॉ. जाकिर हुसैन अथवा के.आर. नारायणन की तरह) एक प्रतिभावान् किंतु प्रभावहीन बुद्धिाीवी होने की बजाए वित्तमंत्री और प्रधानमंत्री के रूप में वे कई मायनों में एक उत्तम प्राथमिक टीचर तो बने। गठाोड़ सरकार के प्रधानमंत्री के रूप में आज मनमोहन सिंह एक अभूतपूर्व प्रगति की रफ्तार पैदा करने वाली, पर स्वयं लगभग गतिहीन धुरी हैं। और यही सत्य हमें इस बेतुके नतीजे पर भी पहुँचाता है, कि मनमोहन सिंह जसे मेधावी अर्थशास्त्री को उदारीकृत अर्थव्यवस्था को चलाने और ग्लोबल विश्वव्यवस्था से अंतरंग बातचीत का डबल रोल थमाने के पीछे कहीं न कहीं कांग्रेस के मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक निहित स्वार्थ भी सक्रिय हैं। अलबत्ता इन्हें लेकर प्रधानमंत्री और हाईकमान के बीच एक सय शिष्ट समझौता बना हुआ है। इसमें दो राय नहीं कि डॉ. सिंह के पास विश्व इतिहास का एक ताजा, व्यापक और स्पष्ट दर्शन है। दुनिया के बाजारों में घट रही अभूतपूर्व गतिविधियों को समझ पाने की एक गहरी क्षमता भी उनमें है, और समय समय पर सार्वजनिक रूप से अभिव्यक्त उनके विचारों में (अगर हम उन्हें सुनने की बजाए पढ़ें तो) एक विस्मयकारी दृढ़ता और निरंतरता भी हमें नजर आती है। लेकिन कांग्रेस तथा प्रधानमंत्री के दरम्यान अनकहे अघोषित समझौतों के इस तमाम गड़बड़झाले की वजह से आम भारतीय मतदाता को अक्सर लगने लगता है कि अपने जिन सुसंगत विचारों को वे चार साल से लालकिले की प्राचीरों के ऊपर खड़े होकर दोहराते रहे हैं, उन पर वे अमल नहीं करवा सके हैं। फिर भी लगातार अमेरिका से मैत्री और आर्थिक उदारीकरण जसे लगभग प्रतिबंधित विषयों पर उनके बोलते रहने के फायदे तो हुए ही हैं। इसने देशभर में बेहतर भारत-अमेरिका रिश्तों और मुक्त अर्थव्यवस्था के पक्ष में देशभर में एक जबर्दस्त वातावरण तो रच ही दिया है, पर कांग्रेस के भीतरी गतिशास्त्र के चलते वह अभी तक दुहे जाने की प्रतीक्षा कर रहा है। कुल मिलाकर नए विचारों और आर्थिक दर्शन की लहलहाती फसल उगा पाने में कांग्रेस का असमंजस शोक का विषय नहीं है। अगर कांग्रेस के ही ढंग से कांग्रेस जिंदा रह सकती है, तो सोनिया या डॉ. सिंह उसे एक विपक्षी तेवर बख्श कर नाहक क्यों मरवाएँ? पार्टी का चेतन और प्रबुद्ध अंश इक्कीसवीं में बदलाव की जरूरत खूब समझ रहा है। और पार्टी का अवचेतन और अप्रबुद्ध अंश कॉमरड येचुरी और लालू के दर्शन की लय पर हँसमुख कदमताल भी कर रहा है। और यही पारंपरिक द्वैताद्वैतवाद और कड़वे टकरावों को टालने का गुण (?) त्वरित, स्पष्ट, रैडिकल बदलाव से खौफ खाने वाले मध्यवर्गीय मतदाता को आश्वस्त करता है। अगर मनमोहनसिंह को मात्र एक रबर स्टांप प्रतीक और कांग्रेस को एक कभी न बदलने वाली पार्टी मानने की बजाए स्थिति को कांग्रेस की इन तमाम भीतरी डाइनेमिक्स और ऐतिहासिक पर्तो के कोण से देखा जाए, तो शायद निखालिस भारतीय राजनीति और कांग्रेस की अर्थनीति के बार में व्याप्त कई तरह की बौद्धिक शंकाओं के धुंध को मिटाया जा सकेगा। कई बरस पहले चीनी आक्रमण के बाद (शायद भुवनेश्वर अधिवेशन में) लालबहादुर शास्त्री ने (ाो तब तक प्रधानमंत्री नहीं बने थे) कहा था कि जिंदगी न तो पूरी तरह तर्कसंगत है, और न ही जादुई (लाइफ इÊा नाइदर लॉजिक नॉर मैजिक)। डॉ. सिंह भी कांग्रेस के इस गैर नेहरू-गाँधी दर्शन से सहमत होंगे।ं

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