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डीआरडीओ को छोड़कर जा रहे हैं वैज्ञानिक

देश के रक्षा बलों के लिए अत्याधुनिक बनाने के काम में जुटे रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीआे) से हर दूसरे दिन एक रक्षा वैज्ञानिक इस्तीफा दे रहा है। डीआरडीआे से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार उसके करीब सात हजार वैज्ञानिकों की जमात में से पिछले पांच साल में ग्यारह सौ से यादा वैज्ञानिक बेहतर वेतन और सुविधाआें की तलाश में संगठन का दामन छोड़ चुके हैं। यह भी दिलचस्प है कि डीआरडीआे के कर्मचारियों की संख्या तीस हजार को पार कर चुकी है और उनमें वैज्ञानिकों की संख्या बीस प्रतिशत भी नहीं है। यह आलम तब है जबकि डीआरडीआे देश के लिए मिसाइलें, टैंक, गोला-बारूद और विमान तक बनाने के काम में जुटा है। डीआरडीआे के एक अधिकारी ने स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि सबसे संगीन बात यह है कि संगठन से इस्तीफा देने वालों में यादातर युवा वैज्ञानिक हैं, जो दो साल की नौकरी करने के बाद उज्वल भविष्य की आेर कदम बढ़ा देते हैं। डीआरडीआे में काम करने का अनुभव उनके लिए बढ़िया प्रक्षेपण स्थल साबित हो रहा है। हाल ही में सरकार ने इन वैज्ञानिक प्रतिभाआें को संगठन में रोकने के लिए कुछ प्रोत्साहन दिए हैं, लेकिन युवा वैज्ञानिकों के अनुसार ये उपाय हास्यास्पद ही है। एक वैज्ञानिक ने नाम गोपनीय रखने की शर्त पर कहा कि हमें बताया गया है कि हमारे निवास पर अब इंटरनेट की सुविधा मिलेगी। यह बात सुनकर हमें ही नहीं देशवासियों को भी हंसी आनी चाहिए कि देश के रक्षा वैज्ञानिकों को इंटरनेट की सुविधा भी नहीं मिल रही थी। वैज्ञानिक ने कहा कि निजी क्षेत्र में वैज्ञानिकों को वाई फाई जोन वाले परिसरों में आवास दिए जाते हैं। लैपटोप जीवन का हिस्सा है और वेतन सम्मानजनक होता है। छठे वेतन आयोग ने भी युवा वैज्ञानिकों में आशा नहीं जगाई है और संगठन छोड़ने वाले वैज्ञानिकों की संख्या जस की तस बनी हुई है। इस बीच सरकार ने अनिवासी भारतीयों को आकर्षित करने की योजना पर भी अमल किया है और करीब 70 अनिवासी भारतीयों को वैज्ञानिकों के तौर पर नियुक्ित भी दी गई है, लेकिन संगठन छोड़ने वाले वैज्ञानिकों की संख्या के तुलना में यह आंकड़ा कहीं भी नहीं ठहरता।

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