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महंगाई पर हायतौबा

इसे जरूरत से ज्यादा तीखी प्रतिक्रिया भी माना जा सकता है और इसमें प्रधानमंत्री की खीझ को भी पढ़ा जा सकता है। लेकिन महंगाई के मसले पर मनमोहन सिंह के पास मांगपत्र लेकर पहुंचे वामपंथी दलों से उन्होंने कहा वह कम दमदार हो ऐसा भी नहीं है। वामपंथी चाहते थे कि निजी कंपनियों द्वारा सीधे किसानों से अनाज की खरीद पर पाबंदी लगाई जाए, 25 आवश्यक वस्तुओं की फ्यूचर ट्रेडिंग बंद हो, कस्टम व एक्साइÊा डय़ूटी कम करके पेट्रोल-डीÊाल वगैरह का दाम घटाया जाए, सार्वजनिक वितरण प्रणाली को पूरी जनता तक पहुंचाया जाए, जमाखोरों के खिलाफ कार्रवाई की जाए वगैरह। प्रधानमंत्री का तर्क था कि इनमें से बहुत सार कदम ऐसे हैं, जो फिलहाल व्यवहारिक नहीं हैं और अगर वे उठा भी लिए गए तो उनका कीमतों पर कोई असर पड़ने वाला नहीं है। वामपंथियों की अपनी सोच है और प्रधानमंत्री की अपनी। महंगाई पर किस तरह से काबू पाया जाए इस पर दोनों के विचार एक नहीं हो सकते। यह भी लगभग तय ही है। यह ऐसी चीज है, जिसे वे सब भी मान कर ही चल रहे होंगे। लेकिन समस्या उस नसीहत पर है, जो इस मौके के तुरंत बाद प्रधानमंत्री ने राजनैतिक दलों को दी। प्रधानमंत्री ने अपने बयान में कहा कि राजनैतिक दलों को महंगाई जसे मसले उठाकर लोगों की गरीबी का राजनीतिककरण नहीं करना चाहिए। तर्क यह था कि राजनैतिक दल ऐसे मसले उठाकर जरूरी चीजों की किल्लत का माहौल बना देते हैं। लोकतंत्र की राजनीति में यह उम्मीद की जाती है कि शासक दल अपनी उपलब्धियों को जनता के पास ले जाएगा और विपक्षी दल उसकी नाकामियों को उठाकर उसके खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश करंगे। भारतीय जनता पार्टी के नेता जब आटे, दाल, सब्जी की मूल्य सूची पहनकर जनता के बीच जाते हैं या प्रधानमंत्री को ज्ञापन देने जाते हैं तो वे इसी परंपरा का पालन कर रहे होते हैं। ये तरीके किसी भी प्रधानमंत्री या किसी भी राजनीतिक दल को भले ही कितना ही आहत करते हों, लेकिन लोकतंत्र में समस्याओं के समाधान और राजनैतिक दलों के सत्ता में पहुंचने की राह बनाने का यही एक वाािब तरीका है। इसके खिलाफ किसी भी तरह की खीझ गैरारूरी ही नहीं ग़लत भी है। समर्थन-विरोध की वामपंथी राजनीति सरकार का स्थायी सरदर्द है। फिर भी प्रधानमंत्री से धैर्य की उम्मीद तो की ही जानी चाहिए।

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