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टैक्स छूट समाप्ति प्रस्ताव से तेल कचचंपनियां घबराईं

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के बढ़ते दाम के बोझ तले दबी तेल कंपनियों को इस साल के बजट में नई रिफाइनरी तथा तेल एवं गैस उत्पादन पर सात साल की कर छूट समाप्त करने वाले प्रावधान से तगड़ा झटका लगा है।ड्ढr वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने इस साल के बजट में कर आधार बढ़ाने के उपायों के तहत तेल क्षेत्रों में वाणिज्यिक उत्पादन शुरू होने तथा खनिज तेल का शोधन शुरू होने के सात साल तक मिलने वाली आयकर छूट के प्रावधान को एक अप्रैल 200से समाप्त करने का प्रस्ताव रखा है। इस प्रस्ताव से तेल खोज में लगी सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र की कंपनियों में निराशा की लहर दौड़ गई। यही नहीं, नई रिफाइनरी लगा रही सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को भी इससे तगड़ा झटका लगा है। इसके चलते सरकार को नई तेल खोज लाईसेंसिंग नीति (नेल्प) के सातवें दौर के तहत आवंटित तेल क्षेत्रों के लिए बोली लगाने की अंतिम तिथि 25 अप्रैल से आगे बढ़ाकर 16 मई 2008 करनी पड़ी। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय से जुड़ी संसद की स्थाई समिति ने भी कर छूट समाप्त करने वाले विवादित बजट प्रस्ताव पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की है। समिति ने अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि सरकार का यह कदम तेल एवं गैस क्षेत्र के विकास के अनुरूप नहीं है। डॉ. एन. जनार्दन रेड्डी की अध्यक्षता वाली इस समिति ने कहा है कि नई रिफाइनरियों को सात साल तक मिलने वाली कर छूट समाप्त कर दिए जाने से पारादीप, बीना और बठिन्डा में लग रही सार्वजनिक क्षेत्र की रिफाइनरी परियोजनाओं पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। इन सभी रिफाइनरियों में अप्रैल 200े बाद ही उत्पादन शुरू होने का अनुमान है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि रिलायंस की जामनगर में लगाई जा रही दूसरी रिफाइनरी परियोजना में इसी वर्ष के अंत तक उत्पादन कार्य शुरू हो जाने की उम्मीद है, इस लिहाज से उसे अगले सात वर्ष तक कर छूट का लाभ मिलता रहेगा। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने इस संबंध में वित्त मंत्रालय को सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों के हित में कर प्रस्तावों में उचित बदलाव करने का आग्रह किया है। तेल कंपनियों के बढ़ते घाटे को लेकर पेट्रोलियम मंत्रालय पहले ही काफी चिंतित है। विश्व बाजार में कच्चे तेल के दाम 120 डॉलर की ऊंचाई को छूने के बाद फिलहाल 115 डॉलर प्रति बैरल के आसपास चल रहे हैं। विदेशों से कच्चे तेल का आयात महंगा होने के बावजूद घरेलू बाजार में पेट्रोलियम पदाथोर्ं के दाम नहीं बढ़ा पाने की तेल कंपनियों की मजबूरी के चलते 2007-08 में उन्हें करीब 78,000 करोड़ रुपए का घाटा उठाना पड़ा, जिसकी भरपाई विशेष तेल बौंड तथा तेल एवं गैस उत्पादक कंपनियों की मदद से किसी तरह हो पाई। लेकिन इस साल यदि स्थिति ऐसी ही रही तो घाटा डेढ़ लाख करोड़ रुपए तक पहुंचने की आशंका है। संसद की स्थाई समिति ने 2008-0ी अनुदान मांगों की समीक्षा के बाद जारी रिपोर्ट में इथनॉल को घोषित माल की श्रेणी में शामिल करने और तेल खोज एवं उत्पादन को ढांचागत श्रेणी का दर्जा देने की भी मांग की है। समिति ने रसोई गैस और सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत वितरित होने वाले मिट्टी तेल पर सरकारी सहायता बढ़ाने की भी पुरजोर मांग की है। समिति ने कहा है कि इन दोंनों पेट्रोलियम उत्पादों पर सहायता योजना 2010 तक बढ़ाने के उपरांत भी सरकार ने इनकी बजट सहायता में कोई वृद्धि नहीं की है। समिति के मुताबिक मिट्टी तेल पर सरकारी बजट सहायता 0.82 पैसे प्रति लीटर दी जाती है, जबकि 15.20 रुपए लीटर कंपनियां स्वयं वहन करती हैं। इसी प्रकार घरेलू उपयोग के सिलेंडर पर बजट सहायता 22.58 रुपए रही है, जबकि 180 रुपए प्रति सिलेंडर का बोझ कंपनियां स्वयं वहन करती हैं। तेल कंपनियों पर सारा बोझ डालने के बजाय सरकार को बजट से सहायता जारी करनी चाहिए।

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