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बढ़ती महंगाई से रिचार्व बैंक की चुनौती बरकरार

धीमी पड़ती आर्थिक वृद्धि की रफ्तार और बढ़ती महंगाई इन दोंनों ही मोचोर्ं पर इस बार भी भारतीय रिजर्व बैंक के समक्ष चुनौती बरकरार है। रिजर्व बैंक के गवर्नर वाई.वी. रेड्डी 2अप्रैल को जब 2008-0ी वार्षिक ऋण एवं मौद्रिक नीति की घोषणा करेंगे, तो उनके सामने पिछले दो सालों से जो चुनौती थी, वही इस बार भी और विकराल रूप लिये सामने खड़ी है। हालांकि रिजर्व बैंक वार्षिक ऋण नीति की घोषणा करने से करीब दस दिन पहले ही महंगाई पर काबू करने के अपने सबसे अहम हथियार का इस्तेमाल कर चुका है। बैंकों के नकद सुरक्षित अनुपात (सीआरआर) में आधा प्रतिशत वृद्धि की घोषणा कर इसे 8 प्रतिशत पर पहुंचा दिया गया है। चौथाई प्रतिशत की वृद्धि 26 अप्रैल से लागू हो चुकी है, जबकि चौथाई प्रतिशत की दूसरी वृद्धि 10 मई से लागू होगी। अप्रैल 2006 से लेकर पिछले दो साल में बैंकों का नकद आरक्षित अनुपात पांच प्रतिशत से बढ़कर आठ प्रतिशत तक पहुंच चुका है, लेकिन महंगाई है कि काबू में आते-आते फिर आसमान पर पहुंच जाती है। केन्द्रीय बैंक पिछले दो सालों से लगातार मूल्य स्थिरता और आर्थिक विकास की गति बनाए रखने के दो मोचोर्ं पर लड़ता आ रहा है, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय तथा घरेलू परिस्थितियां ही कुछ ऐसी बन पड़ती हैं कि महंगाई भी काबू में नहीं आई और अब आर्थिक वृद्धि की रफ्तार भी कुछ धीमी पड़ती दिखाई देने लगी है। केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) के फरवरी में जारी अग्रिम अनुमानों के मुताबिक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर वर्ष 2007-08 में 8.7 प्रतिशत रहेगी, जबकि इससे पिछले वर्ष 2006-07 में यह प्रतिशत की ऊंचाई पर थी। रिजर्व बैंक की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि आर्थिक वृद्धि की तेज रफ्तार कम नहीं होनी चाहिए और दूसरी तरफ महंगाई भी नहीं बढ़नी चाहिए। इसी कशमकश में केन्द्रीय बैंक विभिन्न मोचोर्ं पर अपनी लड़ाई लड़ रहा है। महंगाई को काबू में रखने के लिए रिजर्व बैंक ने पिछले दो वषों में कई कदम उठाए। घरेलू आर्थिक तंत्र में मुद्रा प्रसार को सीमित रखने के लिए पिछले वर्ष की मौद्रिक नीति में एम-3 को 20.8 प्रतिशत से घटाकर 17 प्रतिशत पर काबू करने का लक्ष्य रखा, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद यह 4 जनवरी 2008 को 22.4 प्रतिशत की ऊंचाई पर थी। यही नहीं बैंकों की जमा पूंजी में भी इस दौरान 25 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई। थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति का आंकडा, जिसे बैंक ने 5 प्रतिशत और मध्यम काल में 4 से 4.5 प्रतिशत के दायरे में रखने का लक्ष्य रखा था, वह 2जनवरी 2008 को मौद्रिक एवं ऋण नीति की तीसरी तिमाही की समीक्षा के समय 6.4 प्रतिशत की शुरुआती उंचाई से घटकर 3.8 प्रतिशत तक नीचे आ चुका था लेकिन मार्च के अंतिम सप्ताहों में इसने फिर तेजी की रफ्तार पकड़ ली और पांच-छह यहां तक की सात प्रतिशत से भी आगे निकलकर 12 अप्रैल को समाप्त सप्ताह में यह 7.33 प्रतिशत की ऊंचाई पर दर्ज किया गया। केन्द्रीय बैंक ने पिछले साल 24 अप्रैल को जब वार्षिक ऋण एवं मौद्रिक नीति की घोषणा की थी तो बैंक दर 6 प्रतिशत, सीआरआर 6.5 प्रतिशत, बैंकों के लिए रिवर्स रिपो दर 6 और रिपो रेट 7.75 प्रतिशत पर थे। एक साल बीत जाने के बाद आज बैंक दर तो 6 प्रतिशत पर ही स्थिर है, लेकिन सीआरआर की दर डेढ़ प्रतिशत बढ़कर 8 प्रतिशत तक पहुंचने की तैयारी में है। रिवर्स रिपो और रिपो दर में पौने दो प्रतिशत का अंतर बरकरार है, जबकि पहले यह एक प्रतिशत रहता आया है। इस साल जनवरी में जब महंगाई की दर चार प्रतिशत से भी नीचे आ गई थी, तब उद्योग जगत और आम नौकरीपेशा लोगों की बीच ब्याज दरों में कमी आने की उम्मीद जगी थी। वित्त मंत्रालय से भी ब्याज दरों में कमी के संकेत दिए जाने लगे थे, लेकिन यह उम्मीद जल्द ही चिंता में बदल गई। महंगाई की दर सात प्रतिशत से ऊपर चले जाने के बाद अब ब्याज दरें बढ़ने की आशंका घर कर रही है।

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  • Web Title: महंगाई से आरबीआईकी चुनौती बरकरार