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गेहूँ से फिर भर जाएगी झोली

0 के दशक में गेहूँ की नई प्रजातियों को विकसित कर देश को अनाज संकट से उबारने वाले चन्द्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय (सीएसए) ने फिर गेहूँ की बढ़ती कमी को खत्म करने की चुनौती स्वीकार कर ली है। दो साल में देश-विदेश के गेहँू के जर्मप्लाज्म (ाीवन द्रव्य जिसमें पौधे के विभिन्न गुण होते हैं) से एसी प्रजातियाँ विकसित करने में सीएसए को कामयाबी मिल जाएगी जिन पर ग्लोबल वार्मिग बेअसर साबित होगी।ड्ढr सीएसए के वैज्ञानिकों का मानना है कि भारत समेत दुनिया भर में गेहूँ उत्पादन में आया संकट ग्लोबल वार्मिग का नतीजा है। पहले भी के-68 प्रजाति विकसित कर देश को संकट से उबार चुके सीएसए ने अब ग्लोबल वार्मिग से निपटने के लिए शोध शुरू कर दिया है। निदेशक शोध डॉ. आरपी कटियार ने बताया कि विवि में थर्मो इनसेंसिटिव वैराइटी और टर्मिनल हीट टॉलरंस वैराइटी पर शोध शुरू किया गया है। थर्मो इनसेंसिटिव वैरायटी में गेहूँ की एसी प्रजातियाँ विकसित की जाएँगी जो घटते-बढ़ते तापमान को सह सकेंगी। मौजूदा वक्त में जब एकदम तापमान बढ़ता या घटता है तो गेहूँ के पौधे इसे सह नहीं पाते और मर जाते हैं। इससे पैदावार पर असर पड़ता है। इसी तरह टर्मिनल हीट टॉलरंस वैराइटी में दानों को बचाने की कोशिश की जा रही है। इसमें बाली के ऊपर जब दाना सफेद होता है तो वह तापमान के बढ़ने या घटने से पतला या छोटा रह जाता है। दाना अक्सर गिर भी जाता है। पर गेहूँ की नई नस्ल में एसा नहीं होगा। इन प्रजातियों को विकसित कर खेतों में लाने के लिए दो साल का वक्त लग सकता है लेकिन इससे यह उम्मी‘द है कि ये नई प्रजातियाँ देश में के-68 जसी क्रांति लाने में सफल होंगी। वर्ष 1000 में देश में सबसे ज्यादा गेहूँ उत्पादन 76.37 मिलियन टन हुआ था लेकिन बाद के सालों में इसमें गिरावट का ट्रेंड चल रहा है।ं

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