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राजनाथ पर हल्ला लेकिन घाटे में हैं आडवाणी

भाजपा के लौह पुरुष लालकृष्ण आडवाणी को पार्टी का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने के बाद इस बात की उम्मीद जगी थी कि अब पार्टी की गुटबाजी खत्म हो जाएगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। पार्टी आलाकमान से लेकर राज्यों की इकाईयां इस गुटबाजी में झुलस रही हैं। ताजा उदाहरण महाराष्ट्र और बिहार का है। राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश भी इससे अछूते नहीं हैं। बिहार में बगावत का यह आलम है कि उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी को हटाने के सवाल पर दो दर्जन से अधिक विधायक इस्तीफा देने पर अड़े हैं। असल में राज्यों की बगावतों और आलाकमान में गुटबाजी का असली कारण है आडवाणी समर्थकों द्वारा पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह पर हल्ला बोला जाना। पार्टी में दूसरी पंक्ति के नेता और आडवाणी कोर ग्रुप के सदस्य वेंकैया नायडू, अरुण जेतली, अनंत कुमार, सुषमा स्वराज आदि बार-बार राजनाथ को घेरने की कोशिश कर रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि इस मुहिम को आडवाणी का पूरा समर्थन प्राप्त नहीं हैं। वजह साफ है, आडवाणी 200े लोकसभा चुनाव पर नजर गड़ाए हैं। वह चाहते हैं कि सब मिलजुल कर उन्हें पीएमओ तक पहुंचाएं। बावजूद इसके ये नेता राजनाथ को अपमानित और घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं। इसी की प्रतिक्रिया है कि राजनाथ खेमा भी इन नेताओं पर हमलावर हो गया है। महाराष्ट्र में महासचिव गोपीनाथ मुंडे के पक्ष में राजनाथ खुल कर सामने आए। उनकी जीत भी हुई। अब बिहार की बारी है। बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी को आडवाणी के करीब माना जाता है। उनकी भी राजनाथ समर्थकों ने घेरबंदी की है। उन पर कभी भी गाज गिर सकती है। दूसरी पंक्ति के नेताओं की उलटबांसियों से परशान राजनाथ कई बार कह चुके हैं कि वे कागजी अध्यक्ष नहीं हैं। महासचिव ओम माथुर की राजस्थान प्रदेश अध्यक्ष पर नियुक्ति से नाराज जब मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे कोपभवन में बैठ गईं थी, तब आडवाणी के हस्तक्षेप के बाद भी राजनाथ ने अपना फैसला नहीं बदला था। इस जंग का परिणाम जो भी हो, लेकिन एक बात सच है कि आडवाणी के पीएमओ तक पहुंचने की डगर कठिन होती जा रही है।

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