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यहां आएं तो बदल जाएंगे विकास के मायने

चुनाव का मौसम है। वादे ही वादे हैं। हर आदमी की दिक्कतों को दूर करने के वादे और एक-दूसरे पर बर्बादी के आरोप भी। लूटा-लूटा की धुन जपते नेताओं के बीच इन दिनों झारखंड के कई शहरों में जाने का मौका मिला। दिक्कतें तो रांची, धनबाद और जमशेदपुर जैसे बड़े शहरों में ही कम नहीं, लेकिन इस बार जो बात बताने का प्रयास है वह किसी बड़े शहर या खास गांव की नहीं। एक आम से गांव की है, जो एक नहीं सैकड़ों हैं झारखंड में। इन गांवों से निकलते समय खयाल आता है, आखिर इनके लिए विकास का मतलब क्या है। और उस पर खर्च क्या आएगा, वह भी अधिकतम।

किसी भी शहर से बाहर निकलिए.. आबादी पार करने के साथ एक जैसे दृश्य दिखाई देते हैं। चेहरे भी एक ही जैसे और दर्द भी, लेकिन अब यह उनकी आदत बन गई है शायद इसी वजह से मस्ती भी इसी दर्द में देखी जा सकती है।

चौड़ी सड़क से फर्राटे भरती कार की खिड़की से देखा तो एक तालाब में एक तरफ कुछ महिलाएं बर्तन धो रहीं थीं। थोड़ी दूर पर कुछ बच्चे नहाते हुए दिखे। पीने का पानी भी इसी तालाब से और तालाब में ही भैंसों का स्नान। यह दृश्य भले बताने में जरा अजीब सा लगे लेकिन अपने राज्य में यह बेहद आम है। हर सड़क के किनारे है और हर शहर और क्षेत्र में है। न संथाल अछूता है, न कोल्हान और रांची के आसपास के इलाके। लिहाजा अलग किसी गांव का नाम लिखने की जरूरत नहीं लग रही।

इस सबको देख कर सोचा कि जहां अपने शहर में  विकास के नाम पर एक दूसरे को दोष देते नेता फ्लाई ओवर, मेट्रो ट्रेन या मोनो ट्रेन के वादे करते हैं। आधुनिक पार्क और चौड़ी सड़कों का वादा करते हैं। अगर इन नेताओं को ऐसे किसी तालाब के किनारे लाया जाए तो क्या सपने दिखाएंगे। क्या कहेंगे कि साठ साल में क्या नहीं हो पाया और किसने नहीं किया। झारखंड की स्थापना के चौदह साल में सभी दल किसी न किसी रूप में सरकार में शामिल रह चुके हैं। फिर किसे दोष देंगे और क्या वादा करेंगे। कई बार अलग-अलग तरह से सोच कर लगा कि... या तो चुप हो जाएंगे या फिर एक चापाकल यहां के विकास की गाथा के लिए काफी होगा, जिससे कम से कम पीने का पानी तो साफ पी सकेंगे।

कई खरब का लोहा देने वाला चाईबासा और इसी तरह से कई राज्यों को रोशन करने वाला कोयलांचल (धनबाद) के पास के इलाके भी पीने के साफ पानी के सपने देखते हैं। एक तरफ लाल पानी है तो दूसरी तरफ काला। यह सिर्फ रंग ही नहीं जहरीले रसायनों से भरा है। अगर कोई नेता वाकई वादा ही करना चाहता है तो कुछ और करे न करे, पीने के साफ पानी की बात तो करे। बाकी विकास जहां करना है करता रहे। 

 

 

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