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सरकारी फैक्ट्री से ही नकली दवा का धंधा

सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केन्द्रों में यूपी ड्रग एण्ड फार्मास्युटिकल कंपनी लिमिटेड (यूपीडीपीएल) का ठप्पा लगा कर नकली दवाएँ बाँटी गईं। यह सब इसके अफसरों और दवा माफिया की मिलीभगत से हुआ। आर्थिक अपराध अनुसंधान शाखा की जाँच ने नकली दवा के अब तक के सबसे बड़े घोटाले का खुलासा किया है। इस मामले में पहली एफआईआर दर्ज हो गई है, जिसमें एक सीएमओ समेत यूपीडीपीएल के आधा दर्जन से ज्यादा अफसरों के नाम हैं। सरकारी दवा फैक्ट्री के तत्कालीन एमडी व वरिष्ठ आईएएस अधिकारी आरके सिंह के खिलाफ कार्रवाई की क्षाजत भी सरकार से माँगी गई है। दवा माफिया और अफसरों के गठाोड़ का खुलासा सबसे पहले ‘हिन्दुस्तान’ ने किया था। इस मामले की जाँच कर आर्थिक अपराध अनुसंधान शाखा ईओडब्लू ने अपनी रिपोर्ट शासन को सौंप दी है। गृह विभाग ने प्रमुख सचिव, औद्योगिक विकास व नियुक्ति सचिव को पत्र (67125-8-2008-17 (4)2007) लिखकर यूपीडीपीएल के तत्कालीन प्रबंध निदेशक आरके सिंह व डिप्टी मार्केटिंग मैनेजर डीएल बहुगुणा के खिलाफ विभागीय कार्रवाई करने की सिफारिश की है। ईओडब्लू की रिपोर्ट चौंकाने वाली है। राज्य सरकार ने यूपीडीपीएल के लिए 3दवाएँ आरक्षित की हैं। स्वास्थ्य विभाग को हर साल यूपीडीपीएल से 25 करोड़ रुपए की दवाएँ खरीदनी पड़ती हैं। नकली दवा का कारोबार इसी की आड़ में चलता था। यूपीडीपीएल दवा बनाने के मानक भी पूर नहीं कर रही थी। न उसके पास दवा बनाने का नवीनीकृत लाइसेंस था और ना ही शिड्यूल-एम का संशोधित प्रमाणपत्र। फिर भी यूपीडीपीएल ने पाँच साल में सरकारी अस्पतालों को एक अरब रुपए से ज्यादा की दवाएँ बेंचीं। यूपी ड्रग एण्ड फार्मास्युटिकल कंपनी लिमिटेड (यूपीडीपीएल) से ही नकली दवा का धंधा फल-फूल रहा था। सूत्रों के अनुसार यूपीडीपीएल ने सरकारी अस्पतालों में दवा सप्लाई करने के लिए अनधिकृत एजेंट बना रखे थे, जो यूपीडीपीएल का ठप्पा लगा कर नकली दवाएँ सरकारी अस्पतालों में पहुँचाते थे। यूपीडीपीएल की दवाएँ खरीदना सरकारी अस्पतालों की मजबूरी थी इसलिए यह धंधा पाँच साल तक फलता-फूलता रहा।

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  • Web Title: सरकारी फैक्ट्री से ही नकली दवा का धंधा