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साग-भात खिलाया, मोटरसाइकिल से सड़क तक छोड़कर आए

चाईबासा में नक्सलियों के चंगुल में आए खनन विभाग के अधिकारियों के अपहरण से लेकर रिहाई तक का घटनाक्रम किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं। चौबीस घंटे अधिकारी नक्सलियों के साथ जंगल में थे। अधिकारियों की मानें तो नक्सलियों ने उन्हें खाने में साग-भाग और ठंड से बचने के लिए कंबल भी दिए। उनके आस-पास सात हथियारबंद नक्सली लगातार घेरा बनाए हुए थे। उनकी बात फोन से ही किसी अन्य व्यक्ति से हो रही थी।

पहले दिन तीस घंटे का सफर
अधिकारियों के अनुसार दोपहर माइंस की जांच कर जब वे लौट रहे थे तभी अचानक उनके सामने उग्रवादियों का दस्ता आया और उन्हें अपने कब्जे में कर लिया। बिना कुछ बोले सुने सभी लोगों को अपने घेरे में लेने के बाद उन्हें पैदल लेकर रोरो जंगल की ओर ले गए। अधिकारियों के अनुसार आगे और पीछे हथियारों से लैस उग्रवादी थे। पैदल लगभग तीस किलोमीटर तक चलते रहे। इस दौरान दो पहाड़ियों के उतार चढ़ाव उन्होंने देखा। रास्ते में एक जगह कुछ ग्रामीण भी नजर आए, लेकिन वहां उनके रुख से ऐसा लगा कि उस इलाके में इस तरह से उग्रवादियों का आना-जाना सामान्य बात है।

पड़ाव में पूछा, कौन है तुम लोग...
लगभग दस किलोमीटर तक पैदल ले जाने के बाद जंगल में ही एक जगह में उन्होंने पड़ाव किया। वहीं उनसे पूछा गया कि वे लोग कौन हैं। उन्होंने बताया कि खनन विभाग के अधिकारी हैं तो उसके बाद उन्होंने फोन से किसी से बात की। बातचीत के बाद अपहरण कर ले जा रहे दस्ते के लोगों के चेहरे का भाव बदला हुआ था।

शाम में छोड़ा उन्हें
खनन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि दिनभर उनकी फोन से कहीं और बात होती रही। बातें क्या हो रही थीं, यह उन्हें नहीं मालूम। उन्होंने उग्रवादियों को बताया कि वे लोग भी मजदूरों के हित की ही बात करते हैं। उनसे बात करने वाला कॉलर बार-बार बता रहा था कि पुलिस ने घेरा बनाया हुआ है। अंतत: शाम पांच बजे के आसपास उन्हें उग्रवादियों ने छोड़ दिया। वे पैदल जाना चाह रहे थे तो उन्होंने कहा कि रास्ते में भालू खा जाएगा, इसलिए वे मोटरसाइकिल से छोड़ देते हैं। मोटरसाइकिल से सड़क तक लाने के बाद उन्हें छोड़ दिया गया।

बयान में विरोधाभास, कहीं तीसरी कहानी तो नहीं!
अपहरण के इस मामले में प्रत्यक्षदर्शियों और मुक्त हुए अधिकारियों के बयान में कई विरोधाभास हैं। अधिकारी बताते हैं कि उनका अपहरण बीच रास्ते में किया गया और नक्सलियों को काफी देर बाद पता चला कि वे खनन विभाग के अधिकारी है। उधर, प्रत्यदर्शियों का कहना है कि नक्सलियों को मालूम था कि अधिकारी खनन विभाग से हैं। इसीलिए नक्सली अधिकारियों को माइंस दिखाने के बहाने पहाड़ पर ले गए। उसके बाद उन्हें अगवा कर लिया। अगर नक्सलियों पर अधिकारियों की रिहाई के लिए पुलिस का दबाव था तो मोटरसाइकिल से उन्हें लेकर सड़क तक आने के दौरान रास्ते में उन्हें पुलिस क्यों नहीं मिली? कहीं इस मामले में कोई तीसरी कहानी तो नहीं है?

 

 

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