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बहादुर और जांबाज था संकल्प

बहादुर और जांबाज था संकल्प

साल 2005 का एक दिन (तिथि और माह याद नहीं), अपने घर के पास दफ्तर आने के लिए खड़ा था। इतने में एक बाइक आकर रुकती है। एक हमउम्र शख्स शानदार व्यक्तित्व गर्मजोशी (फौजियों वाला अंदाज) से मिला। अरे शानू (दोस्तों-सहपाठियों के बीच इसी नाम से जाना जाता था) तुम। शानू यानि शहीद लेफ्टिनेंट कर्नल संकल्प कुमार शुक्ला। ये मेरी शानू से अंतिम मुलाकात थी।

बातों ही बातों में संकल्प ने अपना टी-शर्ट उठा दिया। यह क्या, उसके शरीर में गोलियों के ताजा जख्मों के निशान थे। गोली लगने के लगभग आठ निशान। जख्म पूरे भरे नहीं थे। यह उस बहादुर फौजी के साहस का जीता-जाता सबूत था। बात आगे बढ़ी, कहा कश्मीर घाटी में आतंकवादियों से आमने-सामने मुठभेड़ हो गई थी। झारखंड का यह लाल बिल्कुल सामान्य अंदाज में कह रहा था- किसी को भी नहीं छोड़ा, दुश्मनों की कुछ गोलियों मुझे भी लगी थी। ये उन्हीं के निशान हैं। उस समय वह रामगढ़ में तैनात था।

शानू से कॉलेज के दिनों में पहली बार मुलाकात हुई थी। साल 1994 दिसंबर का समय था। सेंट जेवियर्स कॉलेज में गोल्डेन जुबली समारोह की तैयारियां चल रहीं थी। इसी कार्यक्रम में हमारे बैच के भौतिकी ऑनर्स के कुछ दोस्तों (बेदी, सौमेन, मिताली, रिंकू और एक सीनियर थी) ने टीम बनाकर फैशन शो के लिए नाम शामिल किया गया। इसकी तैयारियों के सिलसिले में एक-दो बार चर्चा हुई और टीम में मेरा और शानू (शरीर बढ़िया होने की वजह से) का नाम डाल दिया गया।  शानू का घर तब रांची मेन रोड स्थित दुर्गा बाड़ी के पीछे हुआ करता था। यहीं उससे कई बार मुलाकात होती थी।

यूनियन क्लब के जिम में भी वह अक्सर आता था और हम साथ ही व्यायाम करते थे। यह सिलसिला 1996 तक चला था। इसके बाद संकल्प का चयन भारतीय सेना में हो गया। फौज में जाने के बाद कई बार कॉलेज के दोस्तों (शानू कुमार, उमेश अग्रवाल, सौगाता मित्रा, प्रशांत फ्रैंकलीन) से संकल्प के बारे में चर्चा हो जाती थी, जिसमें उसकी जाबांजी के किस्से होते थे। संकल्प फौजी अभियान में कई मुकाम हासिल कर चुका था। वह 2010-11 में भारतीय शांति सेना के दल में शामिल था। यह दल अफ्रीका में तैनात किया गया था।

शहीद संकल्प इसी माह बनते कर्नल

पटना। शशिभूषण। शहीद संकल्प काफी बहादुर थे। असम में पोस्टिंग के दौरान उल्फा आतंकवादियों से लड़ाई में गंभीर रूप से घायल हो गए थे। लेकिन संकल्प ने उस समय मौत को हरा दिया। मगर इस बार वे मौत को मात नहीं दे सके और शहीद हो गए। यही नहीं, ससुर प्रो. पारसनाथ तिवारी के अनुसार उनमें सेवा भाव कूट-कूट कर भरा था। वे कभी किसी से तेज आवाज में बात नहीं करते थे।

संकल्प इसी महीने लेफ्टिनेंट कर्नल से कर्नल बनने वाले थे, लेकिन इसके पहले ही आतंकवादियों ने उन्हें अपना नापाक निशाना बनाया। संकल्प का शुरू से आर्मी में जाने का लक्ष्य था। जबकि उनके परिवार को ऐसा बैकग्राउंड नहीं था। वे 1999 में आर्मी ज्वाइन किए थे। 2005 में उनकी शादी प्रो. पारसनाथ की बेटी रुचि से हुई। रूची भी थ्रू आउट फर्स्ट क्लास हैं।

रूची नहीं चाहती थी नौकरी करना
प्रो. तिवारी ने बताया कि मेधावी होने के बावजूद रुचि बेटियों के बड़ा होने पर ही नौकरी करना चाहती थी। उसका कहना था कि मां की नौकरी करने की वजह से उनलोगों (रुचि और उसके भाई) को काफी दिक्कत होती थी। रुचि की मां डॉ. शिव कुमारी तिवारी चिरैयाटांड हायर सेकेंड्री स्कूल के प्राचार्य के पद से रिटायर हुई हैं।

टेकारी के मूल रूप से हैं शहीद संकल्प
शहीद संकल्प कुमार मूल रूप से टेकारी (गया) के रहने वाले थे। उनके परदादा टेकारी महाराज के फैमिली डॉक्टर थे। वहीं उनके दादा पटना जीपीओ में पोस्ट मास्टर जेनरल थे। उनका पटना में घर भी था। लेकिन संकल्प के पिता शैलेंद्र कुमार शुक्ला का सीसीएल में इंजीनियर के रूप में नौकरी लग गई और वे वहीं चल गए। फिर बाद में वहीं स्थायी रूप से शिफ्ट कर गए। शहीद संकल्प का ससुराल पटना में ही है।

उनके ससुर प्रो. पारस नाथ तिवारी पटना कॉलेज इतिहास विभाग से हाल ही में रिटायर किए हैं। वे पटना कॉलेज के प्राचार्य भी रह चुके हैं। वर्तमान में नालंदा खुला विवि के इतिहास विभाग में कोऑर्डिनेटर हैं। संकल्प की दोनों बेटियां सारा (7 वर्ष) और मन्ना (चार वर्ष) अभी अपने नाना के पास ही है। प्रो. तिवारी ने बताया कि खबर सुनने के बाद बेटी रुचि पति का शव लाने दिल्ली चली गई है। वे बच्चियों के साथ शनिवार को रांची के लिए निकलेंगे। रुचि दानापुर कंटोमेंटल एरिया के आर्मी क्वार्टर में रहती है। दोनों बेटियां यहीं आर्मी स्कूल में पढम्ती है। रोते हुए प्रो. तिवारी ने बताया कि संकल्प दो भाई-बहन थे। वहीं उनकी बेटी इकलौती है।

बेटियों को नहीं पता, जीवन ने उनके साथ किया कितना बड़ा धोखा
कार्यालय संवाददाता, पटना। केशरी नगर स्थित अपने घर में प्रो. पारस नाथ तिवारी और उनकी पत्नी डॉ. शिव कुमारी तिवारी टीवी के सामने बैठ खबरें देख रहे थे। उनकी आंखों से आंसूओं की धार बह रही थी। लेकिन उनकी नतनी व संकल्प की दोनों बेटियां सारा और मन्ना को मालूम ही नहीं कि जीवन ने उनके साथ बहुत बड़ा धोखा कर दिया है। दूसरे कमरे में दोनों बच्चियां पडमेस की एक लड़की के साथ दुनिया से बेपरवाह होकर खेल रही थी। दरअसल, उन्हें अब तक नहीं बताया गया है कि उनके पिता का साया उसके सिर से उठ चुका है।

प्रो. तिवारी ने बताया कि संकल्प अपने परिवार का काफी ख्याल रखते थे। वे अपनी दोनों बेटियों से काफी जुड़े थे। वहीं बेटियां भी दूर रहकर भी अपने पिता से काफी नजदीक थी। इस वजह से उन्हें उनके पिता के शहीद होने की जानकारी नहीं दी गई है।

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