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अयोध्या विवाद पर सियासत में नया मोड़

अयोध्या विवाद पर सियासत में नया मोड़

बाबरी विध्वंस की बरसी से एक दिन पहले अयोध्या विवाद में सियासत नया मोड़ लेती दिख रही है। रामजन्मभूमि बनाम बाबरी मस्जिद विवाद में मुस्लिम पक्ष के पैरोकार हाशिम अंसारी का यू-टर्न गैरभाजपाई दलों को रास नहीं आ रहा है।

सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव चाहते हैं कि अंसारी को मना कर पुराने रास्ते पर लाया जाए, जिसके लिए वह 55 साल से जद्दोजहद कर रहे हैं। बाबरी मस्जिद के पक्ष में आंदोलन चलाने वालों में हाशिम अंसारी की गिनती सबसे गंभीर लोगों में होती है। इसकी वजह संभवत: यह है कि आंदोलन के अन्य पक्षकारों द्वारा सियासी दामन थामने के बावजूद उन्होंने किसी दल से नाता नहीं जोड़ा। मुकदमे की पैरवी से 95 वर्षीय अंसारी का इनकार किसी भी दल को रास नहीं आ रहा है। वहीं, उनके बयान से भाजपा की जैसे मुंह मांगी मुराद पूरी हो गई है।

दलों में बढ़ रही बेचैनी
सपा प्रमुख नरेंद्र मोदी के खिलाफ तमाम दलों को एकजुट कर महागठबंधन की ओर बढ़ रहे हैं। वहीं, अयोध्या विवाद से अंसारी के हटने से उस हथियार की धार कुंद होती दिख रही है, जिसके बूते अब तक मुस्लिमों को रिझाने और उनका ध्रुवीकरण किया जाता रहा है। हालांकि केंद्र में सरकार बनने के बाद भाजपा मंदिर मुद्दे को ज्यादा तवज्जो नहीं दे रही है। वहीं, अंसारी के निशाने पर आए यूपी के काबीना मंत्री आजम खां का कहना है कि यह मृतप्राय मुद्दा है। वहां तो राममंदिर बन चुका है। लेकिन सपा और उसके करीब आ रहे अन्य दलों में इस बात को लेकर खासी बेचैनी है कि भाजपा कहीं इस मुद्दे का सियासी फायदा न उठा ले। खासतौर से आगामी विधानसभा चुनाव में। इसलिए अंसारी का बयान आने के बाद सपा ने फैजाबाद इकाई के अध्यक्ष जयशंकर पांडेय और पूर्व मंत्री पवन पांडेय को उन्हें मनाने के लिए भेजा। अलग बात है कि अंसारी अभी अपने रुख पर कायम हैं।

हटने से नहीं पड़ेगा असर
अयोध्या में विवादित स्थल के स्वामित्व के मुकदमे में 31 पक्षकार हैं, जिनमें अंसारी सबसे पुराने हैं। मुख्य पक्षकार यूपी सुन्नी वक्फ बोर्ड है। इस मुकदमे में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने 30 सितंबर 2010 को एतिहासिक व विस्तृत निर्णय दिया। बाद में यह मसला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। वह इस पर स्टे हो गया। हाईकोर्ट के निर्णय से जुड़े सभी दस्तावेज व अनुवाद अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच पाए हैं। इसके अलावा बाबरी मस्जिद विध्वंस का मुकदमा अलग से चल रहा है। यूपी सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील व बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के संयोजक जफरयाब जिलानी का कहना है कि चूंकि यह रिप्रेजेंटेटिव सूट है, इसलिए किसी एक पक्षकार के पीछे हटने से मुकदमे पर कोई असर नही पड़ने वाला।

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