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नागरिक अधिकारों के पुरोधा का चले जाना

कई बार यह लगता है कि हमारे देश की बहुत सी व्यवस्थाएं जनहित याचिकाओं के भरोसे ही चल रही हैं। इन जनहित याचिकाओं को शुरू करने और इसकी परंपरा को नई ऊंचाई देने वाले न्यायमूर्ति वीआर कृष्ण अय्यर का चले जाना कई तरह से दुखद है। अपने जीवनकाल में एक किंवदंती बने कृष्ण अय्यर ने न्यायिक धारा को जनोन्मुखी बनाने का काम किया था। हालांकि उन्होंने अपने सक्रिय जीवन की शुरुआत राजनीति से की थी। वह न सिर्फ मद्रास विधानसभा और केरल विधानसभा के लिए विधायक चुने गए थे,  बल्कि केरल की नंबूदिरीपाद सरकार में मंत्री भी रहे। उनके पास गृह मंत्रालय,  विधि विभाग समेत छह महत्वपूर्ण मंत्रालय थे। बाद में वह इतने अच्छे राजनीतिक करियर को छोड़कर केरल उच्च न्यायालय का स्थायी जज बन गए।

आजकल,  जब किसी भी क्षेत्र में प्रसिद्धि पा लेने वाले राजनीति में जाने को लालायित दिखते हैं,  ऐसी शख्सीयत की कल्पना तक असंभव है। शपथ लेते ही उन्होंने कहा था कि उनका प्रयास होगा एक ‘जुडिशियल एक्टिविस्ट’  बनने का, ताकि ताकि हर नागरिक को समानता का अधिकार प्राप्त हो सके। इस शपथ को उन्होंने जीवन भर निभाया। हालांकि उच्चतम न्यायालय में उनकी नियुक्ति को लेकर विवाद खड़ा हुआ था। जब न्यायमूर्ति कृष्ण अय्यर के नाम की अनुशंसा की गई,  तब सोली सोराबजी सहित कई अधिवक्ताओं ने उनकी नियुक्ति का विरोध किया था। यह भी आरोप लगा था कि एक खास विचारधारा वालों से उच्चतम न्यायालय को भरा जा रहा है। लेकिन न्यायमूर्ति अय्यर ने अद्भुत निष्पक्षता का परिचय दिया। जब इंदिरा गांधी के चुनाव को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया,  तो उसके विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर हुई,  जिसमें उच्च न्यायालय के निर्णय पर पूर्ण स्थगन आदेश जारी करने की प्रार्थना की गई। कृष्ण अय्यर का निर्णय था कि इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री के रूप में काम करती रहेंगी,  परंतु सांसद के रूप में वह काम नहीं कर पाएंगी और संसद में मतदान में हिस्सा नहीं लेगी।

यह निर्णय 24 जून, 1975  को दिया गया और केंद्र सरकार ने 25  जून को आपातकाल की घोषणा की। इसलिए कई लोग ऐसा मानते हैं कि आपातकाल की घोषणा के पीछे उच्चतम न्यायालय का निर्णय एक बड़ा कारक तत्व बना। एक बार उन्हें तिहाड़ जेल से एक चिट्ठी मिली,  जिसे उन्होंने याचिका में बदलकर उस पर सुनवाई शुरू कर दी। यह नई परंपरा की शुरुआत थी। उच्चतम न्यायालय में अपने साढ़े सात वर्षों के कार्यकाल में उन्होंने अपने 724 निर्णयों में से 291 फैसले स्वयं लिखे,  जो मील का पत्थर माने जाते हैं। अवकाश ग्रहण के बाद उन्होंने मध्यस्थत (आर्ब्रिट्रेशन) का काम नहीं लिया,  जबकि अन्य जज इसमें करोड़ों रुपये कमा रहे हैं। इसकी बजाय वह अंत तक मानवाधिकार और अन्य सामाजिक मुद्दों के लिए लड़ते रहे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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