DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

आए भी वो गए भी वो, खतम फसाना हो गया

अब इस साल की तो समझिए,  चलाचली की बेला है। कोई भी साल अपने को दोहराता नहीं। अपने यहां की सती-सावित्रियों को यह कामना करनी ही पड़ती है कि मुझे हर जनम में यही पति मिले। पति रिपीट होता रहे। पति से कोई नहीं पूछता कि उसकी कामना क्या है?  जाते हुए साल का लेखा-जोखा करना फिजूल है कि क्या पाया-क्या खोया। इतना ही काफी है कि कितना नहाया,  कितना धोया और कितना निचोड़ा?  जिस देश में आनंद के दाता से ज्ञान मांगने की विडंबना हो,  वहां गया साल क्या दे गया,  जो नया साल देगा?  कौन पत्नी नहीं चाहती कि उसके नाकारा पति के प्राण सलामत रहें?  चाहे प्रतिष्ठा हो न हो,  लेकिन वेतन मिलता रहे। दरअसल,  गया साल-नया साल है क्या?  इंसाफ के तराजू के टूटे हुए पलड़े समझो। न्याय की मूर्ति में आंखें बनाई ही नहीं गईं।

मूर्तिकार ने सीधे-सीधे काली पट्टी बांध दी। जो झंझावात में भी हिलता-डुलता नहीं,  उसे सुरक्षित इंद्रासन कहते हैं। कभी हिला भी तो स्वर्ग की मेनका-रंभा को पृथ्वी पर डांस करने भेज दिया जाता रहा है,  ताकि विश्वामित्र को सद्गृहस्थ बनाया जा सके। परशुराम का फरसा सिर्फ फरसा नहीं होता। कभी-कभी भाइयों और बहनों के रिपीटीशन से भी फरसे का काम हो जाता है। कहते हैं,  जब इतिहास अपने को दोहराता है,  तो कॉमेडी हो जाता है। हे गए साल,  कृपया रिपीट न होना। बार-बार जोकरिंग करने से विदूषक पता नहीं क्यों नायक लगने लगता है। मेरे एक कवि मित्र हैं। पहले विवाहित थे,  अब चिर-कुंवारे हैं। मैंने पूछा- कहो कालिदास,  कैसी कट रही है। वह बोले- आए भी वो/ गए भी वो/ खत्म फसाना हो गया/ पानी भी गुल/ बिजली भी गुल/ अपना नहाना हो गया/ बांझ के घर कुछ न हुआ/ गाना-बजाना हो गया/ झंडी हिली/ गाड़ी चली/ टूटी सड़क/ फूटी गली/ पंच प्रपंचों ने खाया डिनर/ लुच्चे लफंगो ने पी बियर/ भूखों व नंगों का इस तरह/ पीना व खाना हो गया। नए साल में अगर बासी भात को गरम करके परोसा गया,  तो आप कर क्या लेंगे?  नया साल कुंडी खटखटा रहा है,  अब भई जो बोलेगा,  वही तो कुंडी खोलेगा।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:आए भी वो गए भी वो, खतम फसाना हो गया