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बस, एक छोटा सा ब्रेक

बहुत देर से कोशिश कर रहे हैं,  बात नहीं बन रही। शाम से पहले उस काम को पूरा करने का मन बनाया था,  लेकिन कहीं अटक से गए हैं वह। काम करते हुए एक वक्त ऐसा आता है,  जब हम ठीक से ‘फोकस’  नहीं कर पाते। उस वक्त ‘हमें एक ‘ब्रेक’  की जरूरत होती है। छोटा सा ब्रेक हमारे काम पर अच्छा-खासा असर डालता है।’  यह मानना है डॉ. रॉन फ्रीडमैन का। वह मशहूर साइकोलॉजिस्ट हैं। इग्नाइट 80 के संस्थापक हैं। हाल ही में उनकी किताब आई है,  द बेस्ट प्लेस टू वर्क: द आर्ट ऐंड साइंस ऑफ क्रिएटिंग ऐन एक्स्ट्राऑर्डिनरी वर्कप्लेस। अक्सर काम करते हुए ऐसा होता है। हम अपने काम में जुटे होते हैं। धीरे-धीरे हमारे काम की रफ्तार पर असर पड़ने लगता है। एक दौर आता है,  जब काम आगे ही नहीं बढ़ता। हमारा मन तो चाहता है कि उसे निपटाकर ही दम लें, लेकिन..। एक ओर तो हमारा तन कहता है कि थोड़ा-सा आराम कर लें।

दूसरी तरफ महसूस होता है कि कहीं ‘फ्लो’  न टूट जाए। उसी वजह से हम काम करते चले जाते हैं। लेकिन तन की अपनी दिक्कत है। वह थकता ही है। वही नहीं,  दिमाग भी थकता है। और जब वे थकते हैं,  तो उसका असर पड़ना ही है। यही सही वक्त है,  जब हम थोड़ा-सा अपने काम से हट जाएं। हल्का-फुल्का कहीं टहल लें। चाय,  कॉफी पी लें। अपने किसी साथी के साथ बतिया लें। हमें क्या करना है या कैसे करना है?  यह हमें सोचना है। लेकिन छोटा-सा ब्रेक ले लेना है। हम जब भी ब्रेक के बाद आते हैं,  तो ऐसा लगता है,  मानो पर लग गए हों। वह छोटा-सा ब्रेक हमारी ऊब को तोड़ता है। हमें तरोताजा करता है। हम एक नए जोश के साथ जुट जाते हैं। अक्सर अटका हुआ काम खट से हो जाता है।

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