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शादी कराने का पुण्य

भारतीय उपमहाद्वीप के अधिकतर देशों में शादी एक सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी मानी जाती है। आमतौर पर समाज की खुशी और नियमों को अनवरत बनाए रखने के लिए कभी खुशी से,  तो कभी जोर-जबरदस्ती से शादी करवाई जाती है।.. आजकल समाज में ‘लव विद अरेंज’  वाली शादियों का भी प्रचलन हो गया है। इस तरह की शादियां तेजी से प्रचलित हो रही हैं। ऐसी शादियों में बस थोड़ी सावधानी बरतनी होती है,  प्रेम करने से पहले शरलक होम्स की तरह थोड़ी तहकीकात करनी पड़ सकती है। यानी पहले जाति,  धर्म,  उपजाति,  माली हैसियत,  गोत्र वगैरह का पता करके प्रेम में पड़ना पड़ता है। इस प्रकार के प्रेम को परिवार-रिश्तेदार मिल-जुलकर अरेंज्ड कर देते हैं। यानी इसमें प्रेम के साथ सामाजिक शादी की भी फीलिंग आती है।

इस तरह की शादियों में वह सब कुछ होता है,  जो एक सामाजिक शादी में होता है। वैसे भारतीय उपमहाद्वीप में शादी को ‘दो आत्माओं’ का मिलन माना जाता है। दो आत्माओं को मिलाने का परम पुण्य काम प्राय: परिवार-समाज के बुजुर्ग उठाते हैं और इस क्रम में बार्गेनिंग, रूठना-मनाना, तूतू-मैंमैं की पूरी संभावना बनी रहती है। इस उपमहाद्वीप में शादी की महत्ता का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि माना जाता है कि शादी कर देने से हिस्टीरिया,  मिरगी और कई तरह की दिमागी बीमारियां ठीक हो जाती हैं। इसीलिए कई बार धोखे से ऐसे मरीजों से ठीक-ठाक लोगों की शादियां करा दी जाती हैं। चूंकि यह पुण्य का काम है, सो समाज भी चुप रहता है।
जानकी पुल में सदफ नाज

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