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स्वास्थ्य का अंधेरा पक्ष

पंजाब में आंखों के ऑपरेशन के एक कैंप में ऑपरेशन करवाने वाले 60 लोग अंधे हो गए हैं। छत्तीसगढ़ में नसबंदी कैंप में कई महिलाओं की मौत के तुरंत बाद यह हादसा बताता है कि हमारे देश की स्वास्थ्य व्यवस्था में कितनी लापरवाही है। अक्सर लापरवाही नजर में नहीं आती,  क्योंकि मानव शरीर की अपनी शक्ति बहुत सारी चीजें झेल लेती है। दूसरे,  सामान्य नियम यह है कि मरीज जितना गरीब होगा,  उसे मिलने वाली स्वास्थ्य सुविधा उतनी ही निम्न स्तर की होगी। अगर गरीब मरीजों के साथ कोई हादसा हो भी जाए,  तो उस पर शोर नहीं मचता। जब कोई बड़ा हादसा हो जाता है,  तो शोर मचता है,  लेकिन इस बात की कोई उम्मीद नहीं होती है कि उससे कोई परिवर्तन आएगा, क्योंकि तरह-तरह की लापरवाही,  अराजकता और भ्रष्टाचार तंत्र में इतने गहरे व्याप्त हैं कि उसकी सफाई के लिए बहुत बड़े पैमाने पर मुहिम की जरूरत है। छत्तीसगढ़ में एंटीबायोटिक में चूहे मारने का जहर था,  इससे पता चलता है कि छोटे-मोटे कारखानों में दवाएं किस वातावरण में बनती हैं।

यह समस्या एक या दो कारखानों पर कार्रवाई से हल नहीं होगी,  क्योंकि देश भर में ऐसे हजारों कारखाने होंगे। पंजाब का हादसा भी संभवत: ऑपरेशन के दौरान सफाई का इंतजाम न होने या खराब दवाओं की वजह से हुआ है। लेकिन इस हादसे के बाद भी ऑपरेशन के दौरान बेहतर सफाई का इंतजाम नहीं होगा,  न ही नकली और घटिया दवाओं का कारोबार रुकेगा। मोतियाबिंद के ऑपरेशन के बारे में बताया जाता है कि इसकी सफलता की दर 99  प्रतिशत होती है, यानी यह निहायत सुरक्षित ऑपरेशन है,  जिसमें गड़बड़ी की आशंका नहीं के बराबर है। ऐसे ऑपरेशन में भी 60 लोगों की आंखें चली जाएं,  तो इसका मतलब है कि कोई भारी चूक हुई है। मोतियाबिंद के ऑपरेशन में सबसे बड़ा खतरा अगर कुछ हो सकता है,  तो यह संक्रमण का है। अगर ऑपरेशन की जगह और औजारों की सफाई पर ध्यान दिया गया है और ऑपरेशन के बाद अच्छी गुणवत्ता की दवाएं दी गई हैं,  तो इसमें कुछ भी गड़बड़ी होने का खतरा न के बराबर है।

ऐसे ऑपरेशनों में अमूमन गड़बड़ी होती नहीं है,  इसलिए डॉक्टर और ऐसे कैंपों के आयोजक सफाई और सुरक्षा को लेकर लापरवाह होते जाते हैं। किसी दिन इसकी कीमत इसी तरह मरीज चुकाते हैं,  जैसे पंजाब के मरीजों ने चुकाई है। कुछ लापरवाही होती है और कुछ पैसे बचाने की जुगत। कायदे के इंतजाम में वक्त भी लगता है और पैसा भी। कैंपों में गरीब मरीज ही होते हैं,  इसलिए उनका इलाज या ऑपरेशन भी एहसान की तरह ही किया जाता है। आयोजक ज्यादा खर्च नहीं करना चाहते और डॉक्टर कम वक्त में ज्यादा ऑपरेशन कर डालना चाहते हैं। होना तो यह चाहिए कि इस तरह के कैंप लगे ही नहीं। किसी भी मरीज का इलाज और खास तौर पर ऑपरेशन किसी नियमित अस्पताल के कायदे के ऑपरेशन थिएटर में ही होना चाहिए। स्कूलों और धर्मशालाओं में कामचलाऊ ऑपरेशन थिएटर बनाकर और टेंट वालों से किराये के बिस्तरों पर मरीजों को लिटाकर ऑपरेशन करना किसी भी सूरत में असुरक्षित है। लेकिन ऐसा होता इसलिए है कि गरीब मरीजों के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं होती ही नहीं हैं। गरीब महिलाओं की नसबंदी सरकारी आदेश पर लगाए गए कैंपों में और गरीब वृद्ध लोगों के मोतियाबिंद का ऑपरेशन दान के पैसों पर लगे कैंपों में होते हैं। कोई इमरजेंसी न हो,  तो ऐसे कामचलाऊ ऑपरेशन थिएटरों पर पाबंदी होनी चाहिए। लेकिन भारत में स्वास्थ्य सुविधाओं की हालत इस हद तक खराब है कि इन हादसों के बावजूद निकट भविष्य में कुछ बदलने की उम्मीद भी नहीं है।

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