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शिक्षा की खस्ता हालत

भारतीय शिक्षा पद्धति की हालत खराब चल रही है। हाल ही में प्राथमिक शिक्षा पर आई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अब भी पांचवीं कक्षा के कई बच्चे दूसरी कक्षा की किताबें पढ़ नहीं पाते। लेकिन फिलहाल शिक्षा मंत्री की निगाह इस ओर नहीं पड़ रही है। भारत के बड़े-बड़े नेता स्थिति सुधारने की बजाय अपने-अपने चक्कर में लगे हैं। जिस प्रकार बिहार की भोजपुरिया फिल्मों में अभिनेता चिल्लाता है कि  ‘हम बनी बाहुबली’,  ठीक उसी प्रकार यहां भी यह हालत हो गई है कि हमारे नेता कहते फिरते हैं कि  ‘हम बनें मंत्री।’  इस लोकतांत्रिक देश में शिक्षा का अधिकार सबको मिल चुका है,  फिर भी साक्षरता दर बढ़ नहीं रही और सबको उम्दा शिक्षण व्यवस्था हासिल नहीं हो रही है। बड़ा प्रश्न यही है कि जरूरतमंदों को क्या अपना हक मिल पा रहा है?
राजेश रंजन, बिहार
ranjanraja29j@gmail.com

चिंतन करे कांग्रेस

लगता है कि कांग्रेस लोकसभा चुनाव में अपनी हार से सबक लेने को तैयार नहीं है। यही कारण है कि अब भी कांग्रेसी सांसद शीतकालीन सत्र में सिर्फ विरोध के लिए विरोध कर रहे हैं। कांग्रेस का मुख्य लक्ष्य किसी भी बहाने सदन की कार्यवाही को बाधित करना है,  चाहे वह काले धन का मुद्दा हो या फिर आदर्श ग्राम योजना पर सवाल। वास्तविकता यह है कि कांग्रेस ने अपने शासनकाल में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद एसआईटी का गठन नहीं किया,  जिससे काले धन की निष्पक्ष जांच हो सके। वहीं दूसरी ओर,  कांग्रेस अपने छह दशक के शासनकाल में भारत के अधिकांश गांवों में बुनियादी सुविधा पहुंचाने में विफल रही। कांग्रेस की तुष्टिकरण की राजनीति के कारण ही समाज में नफरत बढ़ी है। बेहतर हो कि कांग्रेसी नेता देश की प्रति अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करते हुए सकारात्मकता के साथ आत्ममंथन करें,  अन्यथा वह दिन दूर नहीं,  जब देश में इस ऐतिहासिक पार्टी का कोई नाम लेने वाला नहीं बचेगा।
मुकेश गुप्ता,
राजेंद्र नगर,  साहिबाबाद
mukesh1978@gmail.com

सड़क पर जाती जानें

जितना बड़ा देश,  उतनी ही ज्यादा गाड़ियां। किंतु सड़क पर सुरक्षा के पूरे इंतजाम नहीं हैं। हर साल देश में हजारों लोग सड़क दुर्घटना में अपनी जिंदगी गंवा बैठते हैं। कुछ दिन पहले,  अलीगढ़ में एक छात्र की मौत सड़क दुर्घटना में हो गई। अक्सर देखा गया है कि कहीं ट्रक ‘नो एंट्री जोन’  में घुस गया है,  तो कहीं लोग गाड़ियां बेतरतीब तरीके से चलाते हैं और नियमों की धज्जियां उड़ाते हैं। लेकिन सरकार का ध्यान इस तरफ नहीं है। आखिर कब जागेगी सरकार?  ऐसे में,  मेरी मांग व्यवस्था में बैठे नीचे से ऊपर तक के लोगों से है कि वे सड़क दुर्घटना के मामलों में खास तौर पर आदेश जारी करें कि कसूरवारों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई होगी,  ताकि कल फिर किसी मासूम छात्र की जान न जाए।
हिमांशु गुप्ता, अलीगढ़, उत्तर प्रदेश

माओवादी हिंसा

यह बड़े दुख और दुर्भाग्य की बात है कि कुछ सरकारी उपायों और कदमों के बाद भी माओवादी हिंसा रुकने का नाम नहीं ले रही है। मान्यता यह है कि यह गरीबी, बेरोजगारी, भुखमरी और आर्थिक विषमता व शोषण आदि की अराजकता व घनघोर भ्रष्टाचार की देन है। लेकिन यह भी सत्य है कि माओवादी सिद्धांत कभी किसी को हिंसा की इजाजत नहीं देता,  क्योंकि हिंसा और शोषण-दमन एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। असल में,  माओवाद साम्यवादी व्यवस्था की स्थापना के लिए एक वैचारिक क्रांति है,  मगर दुर्भाग्य से इसकी बागडोर गलत हाथों में जाने से अर्थ का अनर्थ हो रहा है। सच्चे माओवादियों के अनुसार,  जो लोग ये घटिया काम करते हैं,  वे कभी सही और सच्चे माओवादी हो ही नहीं सकते। यह बात बिल्कुल सही है कि ऐसी आतंकवादी हिंसा के खिलाफ सरकार को कड़ाई से पेश आना होगा।
वेद मामूरपुर, नरेला,  दिल्ली
vedmamurpur@gmail.com

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