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फिल्म रिव्यू: सुलेमानी कीड़ा

फिल्म रिव्यू:  सुलेमानी कीड़ा

मंबई की टपोरी भाषा में इस शब्द का इस्तेमाल अक्सर होता है। यह बात पहले ही बता दी वर्ना आपमें से बहुतेरे यहां-वहां खोजते-खंगालते फिरते कि आखिर ये ‘सुलेमानी कीड़ा’  है क्या बला। इस नाम की प्रासंगिकता फिल्म में इतनी भर है कि इसके दो मुख्य किरदार दुलाल  (नवीन कस्तूरिया)  और मैनाक (मयंक तिवारी)  इस नाम से एक फिल्म लिख रहे हैं। ये दोनों एक स्ट्रगलर हैं और बॉलीवुड में कुछ करना चाहते हैं। एक दिन इन दोनों की मुलाकात रूमा  (अदिति वासुदेव)  से होती है तो दुलाल की लाइफ में यू-टर्न आ जाता है। वह रूमा के प्यार में पड़ कर लिखना-विखना ताक पर रख देता है और इस चक्कर में वह मैनाक से दोस्ती भी तोड़ लेता है।

यहां तस्वीर का दूसरा पहलू तब सामने आता है,  जब रूमा दुलाल को यह बताती है कि वह फोटोग्राफी के कोर्स के लिए अमेरिका जा रही है और वह केवल उसके प्यार की वजह से अपने प्रोग्राम को नहीं त्याग सकती। इसके बाद मैनाक गोंजो (करन मीरचंदानी)  को लेकर बनने वाली एक मसाला फिल्म लिखने लग जाता है और दुलाल एक लंबी यात्रा पर निकल जाता है।

अमूमन ऐसी फिल्म समारोहों में दर्शकों की तालियां पाती हैं,  क्योंकि ये असल जिंदगी के बेहद करीब होती हैं। ‘सुलेमानी कीड़ा’  में भी ऐसी बहुतेरी झलक हैं। फिल्म की शुरुआत ही हंसने से होती है। इसके बाद जब पोखरियाल और गोंजो के किरदार आते हैं,  तब और मजा आता है। मैनाक का किरदार अपने आप में कॉमेडी का डोज है,  लेकिन यह फिल्म केवल कॉमेडी नहीं पसोरती। यह कटाक्ष भी करती है। उस ट्रेंड पर जहां सिर्फ अपनी जगह बनाने के लिए समझौते करने पड़ते हैं। बड़े-बड़े निर्माता-निर्देशकों के दोगलेपन की तरफ इशारा करती है। फिर भी ‘सुलेमानी कीड़ा’  न तो एक मुकम्मल प्रेम कहानी बन पाती है और न ही बॉलीवुड स्ट्रगलर्स की व्यथा सुना पाती है। केवल टाइमपास ही करा पाती है। लाउड सिनेमा से बचना चाहते हैं तो यह फिल्म देख सकते हैं।

कलाकार:  नवीन कस्तूरिया,  मयंक तिवारी,  अदिति वासुदेव,  करन मीरचंदानी,  कृष्णा बिष्ट,  रुखसाना तबस्सुम निर्देशक:  अमित मर्सुकर
निर्माता: दत्त दवे,  चैतन्य हेगड़े
संगीत:  अरफाज-अनुराग

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