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दो टूक

गरीब अवाम की आशाओं पर पानी फेरना और उम्मीदें तोड़कर किनारा कर लेना कोई झारखंड के हुक्मरानों से सीखे। इन जनप्रतिनिधियों ने धरती आबा भगवान बिरसा के गांव उलीहातू तक की घोर उपेक्षा की। जिन बिरसा ने देश को आजाद कराने का सपना देखते दम तोड़ दिया, आज उनके गांव में रियाया की जरूरतों के माफिक एक सड़क तक नहीं बनी। अस्पताल नहीं बना, बिजली नहीं रहती। फिर भी ये कितनी बेशर्मी से वोट मांगने के लिए उलीहातू की सड़कें छान रहे हैं। खुद्दारों का यह गांव अपनी विरासत पर गर्व करता है। लोग दिन भर दो शाम की अदद रोटी के लिए हाड़तोड़ मेहनत करते हैं। वे जानते हैं कि उनके वोट की कीमत क्या है। उनका गुस्सा कोई नया गुल खिलायेगा, यह हुक्मरानों को समझ लेना चाहिए।

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