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किराए की कोख और मानवाधिकार पर हुई चर्चा

मेडिकल पर्यटन के परिदृश्य पर तेजी से उभरते गुड़गांव में ‘किराए की कोख और मानवाधिकार’ विषय पर शुक्रवार को आईटीएम विश्वविद्यालय में चर्चा हुई। इस दौरान भारत में किराए की कोख के बढ़ते कारोबार पर चिंता जताई गई। चर्चा के दौरान यह बात उभर कर सामने आई कि भारत में  किराए की कोख के कारोबार में लचर नियम भी विदेशियों को इस धरती पर खींच रहे हैं लेकिन अपनी कोख में दूसरों के लिए औलाद पाने वाली महिलाओं के मानवाधिकार की रक्षा के लिए काफी कुछ करने की जरुरत है।

आईटीएम यूनिवर्सिटी के लॉ स्कूल ने ’सरोगेसी और मानवाधिकार’ विषयक सेमिनार में गंभीर चर्चा हुई। बताया गया कि सरगोसी का अंतरराष्ट्रीय बाजार तकरीबन 6 बिलियन डालर वाषिक का हो चुका है जबकि अकेले भारत में इसका 445 मिलियन का व्यापार हो रहा है। इसके बाद भी इस संबंध में कानूनी स्तर पर स्पष्ट दिशा-निर्देशों का अभाव है।

सेमिनार का उदघाटन करने आए युनाइटेड नेशन हाई कमिश्नर ऑफ रिफ्युजीज-यूएनएचसीआर के डिप्टी चीफ ऑफ मिशन हेंस फेड्रिक स्कॉडर ने किया। इसका स्वास्थ्य एवं पयर्टन के क्षेत्र में पड़ने वाले प्रभाव पर भी चर्चा हुई। स्कॉडर ने कहा कि भारत प्रजनन संबंधी सेवाएं अपनी गुणवत्ता और कम कीमत के लिए जानी जाती है। इस दौरान उन्होंने नागरिकता, आवास, मेडिकल, कानूनी विवाद सरीखे मसले प्रमुख हैं। इस पूरे मामले में दत्तक ग्रहण का मामला भी काफी अहम है।

विश्वविद्यालय के उप कुलपति प्रेमव्रत ने सरोगेसी की व्यवस्था से जुड़े सामाजिक मुद्दे को उठाया। उन्होंने कहा कि सरोगेट बच्चाे के सामाजिक स्वीकार्यता और सरोगेट मां के स्वास्थ्य देखभाल की अहमियत को समझना होगा। सरोगट मदर का आज कई मुश्किलों से गुजरना होता है। कई बार उन्हें शारीरिक देखभाल के साथ मानसिक देखभाल की जरुरत भी होती है। कार्यक्रम में आईवीएफ एक्सपर्ट डॉ सोनिया मलिक, डॉ़ रीता बख्शी और सेंटर फॉर सोशल रिसर्च, नई दिल्ली की डॉ़ मानसी मिश्र ने भी अपना विचार व्यक्त किया।

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