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सिगरेट कंपनियां खुली बिक्री पर रोक के विरोध में

सिगरेट कंपनियां खुली बिक्री पर रोक के विरोध में

तंबाकू की रोकथाम के लिए कार्य कर रहे गैर सरकारी संगठनों का आरोप है कि बड़ी सिगरेट कंपनियां किसानों की आड़ में सिगरेट की खुली बिक्री पर रोक लगाने के फैसले का विरोध कर रही हैं। इन संगठनों ने सरकार को आगाह किया है कि वे लोगों के स्वास्थ्य के व्यापक हित को ध्यान में रखते हुए इन कंपनियों के बहकावे में नहीं आए। संगठनों का तर्क है कि खुली बिक्री को प्रतिबंधित करने से किसानों को नहीं बल्कि सिर्फ सिगरेट कंपनियों को नुकसान होगा।

टाटा मेमोरियल हास्पीटल मुंबई के कैंसर सर्जन और वाइस ऑफ टोबैको विक्टिम के डा. पंकज चतुर्वेदी ने कहा कि पूर्व स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन द्वारा लिए गए फैसले से अब पीछे हटना चौंकाने वाला है। तंबाकू के सेवन से जहां भारत में दस लाख मौतें प्रतिवर्ष होती हैं, वह तंबाकू की खेती में जुड़े किसानों की संख्या महज 70 लाख है। सरकार उन्हें वैकल्पिक खेती उपलब्ध कराए लेकिन तंबाकू संबंधी नियम-कानूनों को लचर नहीं बनाए। उन्होंने कहा कि इस विरोध के पीछे किसान नहीं बल्कि बड़ी सिगरेट कंपनियां हैं।

वालंटरी हैल्थ आर्गेनाइजेशन ऑफ इंडिया की कार्यकारी निदेशक डा. भावना मुखोपाध्याय ने कहा कि सालों से यह समस्या चल रही है, सरकार ने अब तक किसानों को वैकल्पिक खेती के विकल्प नहीं दिए। तंबाकू की खेती से कुल आय छह हजार करोड़ है जबकि इससे होने वाली क्षति एक लाख करोड़ से भी ज्यादा है। इसलिए सरकार को बड़े हित को ध्यान में रखते हुए इस मसले पर अंतिम फैसला करना चाहिए।

देश में प्रतिवर्ष 102 अबर सिगरेटों की बिक्री होती है जिनमें से 70 फीसदी की खुली बिक्री होती है। हिमाचल और उत्तराखंड पहले ही सिगरेट की खुली बिक्री को प्रतिबंधित कर चुके हैं। दुनिया के तमाम देशों में इस पर पाबंदी है। खुली सिगरेट पर क्योंकि चेतावनी नहीं होती है इसलिए कोटपा कानून के तहत उसकी बिक्री प्रतिबंधित है।

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