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लचर प्रबंध शिक्षा, सफल प्रोफेसर

आधुनिक प्रबंध शास्त्र और एमबीए कोर्स बेशक भारत में विकसित हुई अवधारणा नहीं है,  लेकिन आजकल समूची दुनिया के मशहूर प्रबंध संस्थानों में भारतवंशी प्रोफेसरों ने धूम मचा रखी है। एक दर्जन से ज्यादा नामचीन बिजनेस स्कूलों में कई भारतीय डीन के पद पर विराजमान हैं। पिछले 50-60  वर्षों के दौरान अमेरिका,  कनाडा,  ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस,  स्पेन,  ब्रिटेन,  जर्मनी,  चीन,  ताईवान,  जापान,  हांगकांग,  सिंगापुर,  थाईलैंड जैसे देशों में कई कारणों से प्रबंध शिक्षा का काफी विस्तार हुआ है। भारत भी इस दौड़ में शामिल है। दुनिया के कुल 13,000  प्रबंध संस्थानों में 3,000 से ज्यादा भारत में हैं। ठीक यहीं पर यह भी विडंबना है कि दुनिया भर मे भारतीय प्रोफेसरों का इतना रूतबा होने के बावजूद आईआईएम और निजी क्षेत्र के बिजनेस स्कूलों समेत भारत के अपने बिजनेस स्कूल,  विश्व स्तर पर अपनी पहचान नहीं बना पाए हैं। इन दिनों जब मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था और स्कूली शिक्षा को दुरुस्त करने में लगी हैं,  तब भारत की प्रबंध शिक्षा भी अनेक स्तरों पर समस्याओं से जूझ रही है।

दुनिया भर के प्रबंध संस्थानों में धूम मचाने वाले भारतीय प्रोफेसरों में से अधिकांश वे हैं,  जो 1960-70 के दशक में भारत से एमबीए या बीटेक करने के बाद पीएचडी करने के लिए अमेरिका की तरफ कूच कर गए। इसका मुख्य कारण भारत में अनुसंधान के लिए पर्याप्त इन्फ्रास्ट्रक्चर का न होना और हॉर्वर्ड,  व्हार्टन,  येल,  एमआईटी,  कैलोग्स आदि प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा काफी उदारतापूर्वक भारतीयों को पीएचडी करने के लिए स्कॉलरशिप देना था। 1970-80 के दौरान विश्व स्तर पर जो भारतीय प्रोफेसर बहुचर्चित हुए,  वे थे सुमंत्र घोषाल,  सी के प्रहलाद,  जगदीश सेठ,  विजय महाजन, बाला बालाचंद्रन, नरेश मल्होत्रा और वी कुमार। इनमें सुमंत्र घोषाल और सी के प्रहलाद के नाम से प्रबंध के कई मौलिक सिद्धांत और मॉडल लोकप्रिय हुए और औद्योगिक जगत पर उनका व्यापक असर पड़ा। मिसाल के लिए, प्रहलाद की पुस्तक फॉचरून ऐट द बॉटम ऑफ पिरामिड के प्रकाशन के बाद ‘बीओपी’ मॉडल पूरी दुनिया के विकासशील देशों में बहुत लोकप्रिय हो गया।

पिछले दो दशकों (1995-2014)  में जिन भारतीय प्रोफेसरों ने अपने शोध,  अनुसंधान,  प्रकाशन और नेतृत्व क्षमता से प्रबंध जगत में ख्याति अर्जित की है,  वे हैं नितिन नोहरिया,  श्रीकांत दातार (हॉर्वर्ड),  सुनील कुमार (शिकागो बूथ), विजय गोविंदराजन (टक स्कूल),  निर्माल्य कुमार (लंदन बिजनेस स्कूल),  अनिल गुप्ता (स्मिथ),  राज सिसोदिया (बैबसन),  सौमित्र दत्ता (कॉर्नेल),  दीपक जैन (सासकिन) और पंकज घेमावत (आईईएसई)। हॉर्वर्ड बिजनेस स्कूल का भारतीय प्रबंध शिक्षा से पुराना रिश्ता है। वर्ष 1966 में जब आईआईएम अहमदाबाद की स्थापना की गई थी,  तो उसके विकास के प्रारंभिक काल में हॉर्वर्ड का उल्लेखनीय योगदान रहा। आईआईएम अहमदाबाद के कई प्रोफेसर हॉर्वर्ड में प्रशिक्षित किए गए थे और अनेक हॉर्वर्ड के प्रोफेसरों ने वहां आकर अध्यापन भी किया था।

भारत में आईआईएम अहमदाबाद को प्रबंध शिक्षा में ‘केस-मैथड’ जन्मदाता के रूप में जो प्रसिद्धि मिली है,  उसके बीज हॉर्वर्ड के प्रोफसरों ने ही बोए थे। जिस हॉर्वर्ड ने आईआईएम अहमदाबाद को अंगुली पकड़कर चलना सिखाया था,  उसके शीर्ष पद पर नितिन नोहरिया डीन के रूप में 2010 से आसीन हैं। वह हॉर्वर्ड के 106 वर्षों के इतिहास में पहले भारतीय मूल के प्रोफेसर हैं,  जिन्हें हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी ने यह गुरुतर दायित्व सौंपा है। ऐसा दूसरी बार हुआ है,  जबकि अमेरिका के बाहर पैदा हुए किसी प्रोफेसर को हॉर्वर्ड का डीन बनाया गया हो। 16 पुस्तकों के लेखक व सह-लेखक नोहरिया को 2008  में तब बहुत प्रसिद्धि मिली,  जब उन्होंने प्रोफेसर राकेश खुराना के साथ मिलकर इट्स टाइम टू मेक मैनेजमेंट ए ट्र प्रोफेशन शीर्षक से एक लेख लिखा था। उस लेख में उनका कहना था कि अब समय आ गया है कि मेडिकल,  लीगल व ऑडिट पेशों की तरह प्रबंध को भी पेशा माना जाए और हर प्रबंधक की पेशेवर जवाबदेही किसी राष्ट्रीय स्तर की संस्था से हो।

इन दोनों ने ही हॉर्वर्ड के विद्यार्थियों को ‘एमबीए ओथ’  दिलाने की परंपरा प्रारंभ की थी,  जो बाद में पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो गई। इसी हॉर्वर्ड बिजनेस स्कूल में एक और महत्वपूर्ण स्तंभ हैं प्रोफेसर श्रीकांत दातार। वह नोहरिया के भी पहले से यहां पर हैं और आर्थर डिकिन्सन प्रोफेसर पद पर कार्यरत रहे हैं। उन्होंने अपनी अकादमिक यात्रा मुंबई यूनिवर्सिटी  और आईआईएम अहमदाबाद से शुरू की थी। वह भारत में चार्टर्ड एकाउंटेंसी,  कॉस्ट एकाउंटेंसी तथा स्टेनफोर्ड से दो मास्टर डिग्री व पीएचडी की उपाधि ले चुके हैं। उनके माता-पिता भारत की आजादी की लड़ाई में शामिल थे और गांधीजी से बहुत प्रभावित रहे थे। दातार हॉर्वर्ड में इनोवेशन पर क्लास लेते समय गांधीजी के दांडी मार्च का उदाहरण देते हैं कि किस प्रकार गांधीजी स्वाधीनता आंदोलन में इनोवेटिव तरीकों का उपयोग करते थे।

हॉर्वर्ड बिजनेस स्कूल की स्थापना के 100  वर्ष पूरे होने पर साल 2008 में श्रीकांत दातार ने डेविड गार्विन और पैट्रिक कुलिन के साथ मिलकर दुनिया के छह प्रमुख प्रबंध संस्थानों पर शोध किया और 2010 में बहुचर्चित पुस्तक रिथिंकिंग एमबीए  को जारी किया। इस पुस्तक की पूरी दुनिया के प्रबंध-शास्त्रियों में चर्चा हुई। दातार ने इस पुस्तक में 19वीं और 20वीं सदी में विकसित एमबीए कोर्स की कमियों की ओर इशारा करते हुए 21वीं सदी में इसके भविष्य की दिशाओं पर प्रकाश डाला है। लेकिन हॉर्वर्ड बिजनेस स्कूल में भारत के केवल ये ही दो नाम महत्वपूर्ण नहीं हैं। इनके अलावा भारतीय मूल के 15 अन्य प्रोफेसर भी वहां काम कर रहे हैं,  जिनमें कृष्णा पी पलेपू,  बी कस्तूरीरंगन,  रंजय गुलाटी,  तरुण खन्ना,  रोहित देशपांडे,  राकेश खुराना,  वी जी नारायणन,  दास नारायणदास और अनंथ रामन के नाम उल्लेखनीय हैं।

मानव संसाधन मंत्री उच्च शिक्षा,  स्कूली शिक्षा और कौशल शिक्षा को सुधारने के लिए कई घोषणाएं कर चुकी हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी व अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद यानी एआईसीटीई के भविष्य निर्धारण के लिए समीक्षा समितियां नियुक्त की जा चुकी हैं। नई शिक्षा नीति की घोषणा भी अगले वर्ष तक प्रस्तावित है। अच्छा होगा कि हम अपनी शिक्षा प्रणाली में गुणात्मक परिवर्तन के लिए विश्व के शीर्ष विश्वविद्यालयों में प्रतिष्ठित पदों पर कार्य कर रहे भारतीय मूल के प्रोफेसरों की मदद लें। इससे भारतीय शिक्षा संस्थानों को देश के लिए ज्यादा उपयोगी और विश्व-स्तरीय बनाने के रास्ते भी निकल सकते हैं।
 (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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